संसार एक रंगमंच है, जहाँ हम सब अपनी भूमिका निभाने आते हैं। लेकिन कभी-कभी कुछ भूमिकाएँ इतनी कठिन होती हैं कि वे हमें जीवन के असली अर्थ और 'परम शक्ति' के अस्तित्व का साक्षात्कार करा देती हैं। हाल ही में गाजियाबाद के हरीश राणा का प्रसंग और उनकी माँ का वह विदाई वीडियो देखकर मन में एक गहरा वैराग्य उत्पन्न हुआ है।
विज्ञान की हार, प्रारब्ध की जीत
हम अहंकार में कहते हैं कि "मैं कर लूँगा", "मैं बचा लूँगा"। विज्ञान ने मशीनें बनाईं, कानून ने नियम बनाए, लेकिन 13 वर्षों तक कोमा (PVS) में पड़े उस युवक के प्राणों पर किसी का वश नहीं चला। जब विधाता की डोर खिंचती है, तो बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ और संचित धन-दौलत धरे के धरे रह जाते हैं। क्या यह विज्ञान की हार नहीं? क्या यह उस ईश्वर की इच्छा का प्रमाण नहीं कि साँसें देना और लेना केवल उसी के हाथ में है?
ऋण का लेन-देन:
एक मर्मस्पर्शी सत्य इस प्रसंग को देख ऐसा प्रतीत होता है मानो यह पिछले जन्म का कोई गहरा 'लेन-देन' था। माता-पिता ने अपनी पूरी कमाई, अपनी रातों की नींद और अपने जीवन के 13 बहुमूल्य वर्ष उस बच्चे पर न्योछावर कर दिए जो उन्हें पहचान तक नहीं पा रहा था। ऐसा लगा मानो कोई "वसूली" करने वाला आया हो, जिसने माता-पिता के सुख और संपत्ति का पाई-पाई हिसाब बराबर किया। और अंत में, जब माँ ने आईसीयू में हाथ जोड़कर कहा—"सबको माफ करते हुए, अब जाओ बेटा"—तो वह उस ऋण के पूर्ण होने की अंतिम रसीद थी।
परम आश्वासन: केवल कृष्ण आश्रय
जब इंसान असहाय हो जाता है, जब मृत्यु के द्वार पर कानून और विज्ञान बौने हो जाते हैं, तब केवल कृष्ण ही एकमात्र आश्रय बचते हैं। माँ का वह साहस कि "मेरा सोना हिस्सा है तू, पर अब जा," हमें सिखाता है कि इस देह से मोह करना व्यर्थ है। इस क्षण में गीता जी का वह 'चरम श्लोक' हृदय में गूँजता है:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ (श्रीमद्भगवद्गीता, 18.66)
अर्थ: "सब धर्मों (सांसारिक आश्रयों और मोह) को त्यागकर, तू केवल मेरी शरण में आ। मैं तुझे सब पापों (सांसारिक बंधनों और ऋणों) से मुक्त कर दूँगा। तू शोक मत कर।"
हरीश की माँ ने इस श्लोक को वास्तव में जी कर दिखाया। उन्होंने अपने बेटे के लिए अब और कोई सांसारिक उपचार या चमत्कार नहीं माँगा, बस हाथ जोड़कर उसे भगवान की शरण में सौंप दिया।
निष्कर्ष
आज हरीश मुक्त हो गया, पर हम अब भी अपनी इच्छाओं और अहंकार के पिंजरे में कैद हैं। आइए, इस घटना से सीखें कि हम केवल निमित्त मात्र हैं। यह संसार मिथ्या है, केवल उस मुरली मनोहर का प्रेम ही शाश्वत है। मोह को छोड़कर उस 'गोविंद' की शरण में लग जाएँ, जो न कभी छोड़ता है और न जिसका प्रेम कभी खत्म होता है।
✍️ — मधु शर्मा
#विज्ञान
#परम_शक्ति
#इच्छा_मृत्यु
#VedaRicha_

हरे कृष्ण।
जवाब देंहटाएं