शाप से अभिशाप: मर्यादा का सनातन पाठ (उपसंहार) जब रघुकुल की मर्यादा प्राण देकर भी वचन निभाने की सीख देती है, तब एक राजा का कायरतापूर्ण छल पूरे साम्राज्य को भस्म कर देता है। जानिए इस ऐतिहासिक त्रासदी का वह शाश्वत दार्शनिक निष्कर्ष, जो सदियों से सिरमौरी ताल के सूखते नीर में मुक्ति की राह खोज रहा है! उस प्रलयंकारी काल-रात्रि को गिरिगंगा की उत्ताल तरंगों में समाती एक स्वाभिमानी वीरांगना के कंठ से निकला आक्रोष केवल वाणी का एक क्षणिक शाप नहीं था। वह काल के भाल पर खिंची वह अमिट रेखा थी, जो सिरमौरी ताल की पावन धरा के लिए एक अंतहीन, दारुण अभिशाप बन गई। शाप वह बाण था जो उस क्षण छूटा, किंतु अभिशाप वह दीर्घकालिक संताप है जिसे वह भूमि आज एक सहस्राब्दी बीत जाने के बाद भी भोग रही है। सदियां बीत चुकी हैं। अनेक राजवंश आए और चले गए, साम्राज्य बने और ढह गए, किंतु गिरि नदी के तट पर पसरा वह वीराना, वह सूखता हुआ ताल और झाड़ियों के बीच दफन प्रस्तर खंडहर आज भी उस पातक की मूक गवाही दे रहे हैं। डूबी हुई उस प्राचीन राजधानी की आत्मा को आज तक कोई मुक्ति का मार्ग नहीं मिल सका। वह भूमि आज भी प्रायश्चित के आंसुओं में ...
लोक-संस्कृति में जीवित गाथा और रूठी गिरिजा जब प्रकृति किसी छल से आहत होकर रूठ जाती है, तो बस्तियां तो पुनः बस सकती हैं, किंतु ईश्वरीय सान्निध्य लौटकर नहीं आता। जानिए कैसे माँ गिरिजा के विमुख होने से सूखता गया सिरमौरी ताल, और कैसे लोकगीतों की अमर धुन में आज भी सिसकते हैं वे अभिशप्त खंडहर! प्रलय का भयानक तांडव जब थमा, तो गिरि-बाटा घाटी का भूगोल और भाग्य दोनों सदा के लिए बदल चुके थे। अधर्म की सत्ता जलमग्न हो चुकी थी, किंतु इस संहार के बाद भी एक परम रिक्तता उस भूमि पर पसर गई। शास्त्र कहते हैं कि शक्ति जब संहार करती है, तो वह केवल दंड नहीं देती, बल्कि मर्यादाविहीन स्थान का त्याग भी कर देती है। माँ पार्वती की पावन स्वरूपा 'गिरिगंगा' उस छल, विश्वासघात और निर्दोष के बहे रक्त से इस कदर रूष्ट हुईं कि उन्होंने अपनी चिरंतन धारा ही मोड़ ली। वे उस अभिशप्त तट से विमुख हो गईं। जिस पावन नीर के किनारे कभी नागर शैली के स्वर्णिम मंदिर आलोकित होते थे, जहाँ वेद-मंत्र और शंखनाद गूंजते थे, उस तट पर माँ गिरिजा कभी पुनः लौटकर नहीं आईं। पीछे छूट गया केवल एक विशाल, शांत और मटमैला दलदल—जिसे आने वाले कालखंड...