सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

गिरी का काला नीर: एक नटनी का शाप: अंक 5

खंडहरों में दबी गवाही और पुरातात्विक साक्ष्य

जब सदियों पुरानी लोककथाएं टीलों की खुदाई और औपनिवेशिक दस्तावेजों से टकराती हैं, तो रहस्य इतिहास का अकाट्य सत्य बन जाता है। जानिए सिरमौरी ताल के वे पुरातात्विक प्रमाण, जो सिद्ध करते हैं कि नटनी का शाप और जलप्रलय कोई कपोल-कल्पना नहीं, बल्कि एक जीवंत ऐतिहासिक त्रासदी थी!

अक्सर समय की धूल ऐतिहासिक घटनाओं पर रहस्य और किंवदंतियों का ऐसा आवरण चढ़ा देती है कि आने वाली पीढ़ियां उन्हें केवल अलाव के पास बैठकर सुनी जाने वाली लोककथा मान बैठती हैं। किंतु, सिरमौरी ताल का पतन कोई काल्पनिक परिकथा नहीं है। जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं और गिरि नदी के शांत तटों की माटी को टटोलते हैं, तो वहाँ से चीखते हुए ऐसे प्रमाण मिलते हैं जो इस गाथा की प्रामाणिकता पर मुहर लगाते हैं।

इस त्रासदी के सबसे ठोस दस्तावेजी साक्ष्य ब्रिटिश शासन के दौरान संकलित आधिकारिक गजेटियर्स में मिलते हैं। 'गजेटियर ऑफ द सिरमूर स्टेट' (1904 एवं 1934 के संस्करण) में इस घटना का स्पष्ट और गंभीर उल्लेख मिलता है। गजेटियर के अनुसार, सिरमौर रियासत की मूल और प्राचीन राजधानी गिरि नदी के तट पर 'सिरमौरी ताल' में स्थित थी, जो गिरि के विकराल जलप्रलय में रातों-रात नष्ट हो गई थी। गजेटियर में इस विनाश के मूल कारण के रूप में स्थानीय जनमानस में रची-बसी नटनी की शर्त, राजा के विश्वासघात और उसके मुख से निकले शाप को आधिकारिक संदर्भ के साथ दर्ज किया गया है।

इसके अतिरिक्त, सिरमौर के कुंवर रंजोर सिंह द्वारा 1911 के आसपास रचित ऐतिहासिक ग्रंथ 'तारीख-ए-रियासत सिरमौर' (तवारीख-ए-सिरमौर) में इस घटना का विस्तृत विवरण मिलता है। इस ग्रंथ में राजा मदन सिंह के कालखंड, नटनी द्वारा तनी हुई रस्सी पर गिरि नदी को पार करने की चुनौती, छलपूर्वक रस्सी का काटा जाना और उसके उपरांत गिरि नदी में आए जलप्रलय से पूरे नगर के दफन होने का स्पष्ट ऐतिहासिक क्रम दर्ज है।

पहाड़ी रियासतों के इतिहास के सबसे प्रामाणिक अध्येता डॉ. जे. हचिसन और जे.पी.एच. वोगेल ने अपने विश्वप्रसिद्ध शोध ग्रंथ 'History of the Panjab Hill States' (1933) के सिरमौर अध्याय में इस बात की पुष्टि की है कि ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में सिरमौर की पुरानी राजधानी का अस्तित्व समाप्त हो गया था और उसके बाद ही जैसलमेर के यदुवंशी राजवंश (राजा शुभांस प्रकाश) ने इस क्षेत्र में नए शासन की नींव रखी थी।

दस्तावेजों से आगे बढ़कर जब हम धरातल पर नजर डालते हैं, तो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और हिमाचल प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग के सर्वेक्षण अचंभित कर देते हैं:

विशाल प्राचीन ईंटें और नगर-योजना: सिरमौरी ताल के टीलों की ऊपरी सतह और कटावों में आज भी ग्यारहवीं सदी की विशिष्ट पकी हुई लाल ईंटें (Brick-bats) और चूने के गारे से जुड़ी विशाल दीवारें बिखरी मिलती हैं। यह संरचनाएं सिद्ध करती हैं कि यहाँ किसी समय सुनियोजित प्राचीर, राजमहल और सुदृढ़ घाट बने हुए थे।

नागर शैली के स्थापत्य अवशेष: क्षेत्र से प्राप्त नक्काशीदार प्रस्तर खंभे, चौखटें और मंदिरों के शीर्ष पर लगने वाले भारी आमलक यह प्रमाणित करते हैं कि यहाँ भव्य नागर शैली के देवालय विद्यमान थे, जो अचानक आई बाढ़ के मलबे में दब गए।

शिमला राज्य संग्रहालय का संग्रह: हिमाचल राज्य संग्रहालय (चौड़ा मैदान, शिमला) के मूर्तिकला और न्यूमिस्मैटिक (सिक्का) अनुभाग में सिरमौर क्षेत्र से प्राप्त मध्यकालीन प्रस्तर प्रतिमाएं और प्राचीन सिक्के आज भी सुरक्षित हैं। बलुआ पत्थर पर तराशी गई वे देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तत्कालीन उच्चस्तरीय शिल्पकला और राज्य के आर्थिक वैभव की मूक गवाही देती हैं।

स्थानीय देवालयों में सुरक्षित अवशेष: बाढ़ के थपेड़ों से बच निकले कई प्राचीन शिवलिंग और नक्काशीदार शिलाखंड आज भी कटासन देवी मंदिर परिसर तथा आसपास के ग्रामीण चबूतरों पर श्रद्धापूर्वक स्थापित हैं।

मिट्टी के नीचे दबे ये पाषाण और पन्नों में सिमटे ये शब्द एक स्वर में कहते हैं—वह वैभव भी सच था, वह छल भी सच था और गिरिगंगा का वह संहारक न्याय भी एक ऐतिहासिक यथार्थ था।

किंतु, जब इतिहास की किताबें अलमारियों में बंद हो जाती हैं, तब भी कोई उस सत्य को सीने से लगाए गाता रहता है। वह कौन है? वह है देवभूमि का लोक-हृदय!

गिरिपार के सुरों में नटनी की वह पीड़ा सदियों से कैसे तैर रही है?

जानने के लिए जुड़े रहें इस मार्मिक गाथा के अगले अंक से—

अंक 6: लोक-संस्कृति में जीवित गाथा और नाटी के बोल

✍️ - मधु शर्मा 

#GiriKaKalaNeer #SirmaurHistory #HimachalDiaries #VedaRicha #NatniKaShap #AncientHimachal #Archaeology #HistoricalEvidences

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

नेहरू काल और सांस्कृतिक आघात: पंचांग से लेकर हिंदू कोड बिल तक का 'काला सच'

किसी भी राष्ट्र की जीवंतता उसकी जड़ों और उसकी प्राचीन संस्कृति में निहित होती है। लेकिन स्वतंत्र भारत के शुरुआती दशकों में, आधुनिकता और 'धर्मनिरपेक्षता' के नाम पर जिस तरह से भारत की सनातन परंपराओं पर प्रहार किया गया, वह आज के जागरूक समाज के लिए एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। क्या वह सुधार था या भारत की आत्मा को मिटाने की एक सोची-समझी साजिश? 1 . 22 मार्च 1957: भारतीय पंचांग के साथ 'विदेशी' मिलावट: 22 मार्च 1957 का दिन भारतीय इतिहास में एक ऐसे मोड़ के रूप में याद किया जाएगा, जब भारत की वैज्ञानिक गणना वाली काल-निर्धारण पद्धति (विक्रम संवत) की उपेक्षा कर 'शक संवत' को राष्ट्रीय पंचांग घोषित किया गया और साथ में विदेशी 'ग्रेगोरियन कैलेंडर' को प्रशासनिक कार्यों पर थोप दिया गया। साजिश का पहलू : हज़ारों वर्षों से भारत के ऋषि-मुनियों ने नक्षत्रों और सौर-चंद्र गतियों के आधार पर जो सटीक गणना की थी, उसे 'अवैज्ञानिक' या 'पिछड़ा' बताकर किनारे कर दिया गया। एक ऐसे देश में जहाँ हर त्यौहार और खेती की पद्धति पंचांग से जुड़ी थी, वहाँ विदेशी कैलेंडर थोपना सांस्कृतिक वि...

भाग्य का विधाता: स्वयं मनुष्य (प्रारब्ध, पुरुषार्थ और हमारी पांच इंद्रियां)

" नर नाहर, अपनी शक्ति जगा, खम ठोंक, नियति को राह दिखा! तू भाग्य-लेखक, तू ही विधाता, कर्मों की स्याही से गाथा गा!" क्या आपने कभी सोचा है कि जिसे हम 'भाग्य' कहकर हार मान लेते हैं, क्या वह वास्तव में ईश्वर द्वारा लिखित कोई अटल दस्तावेज है? क्या परमात्मा ने हमें केवल परिस्थितियों का दास बनने के लिए इस नश्वर संसार में भेजा है? कदापि नहीं! ईश्वर ने हमें दृष्टि दी, सामर्थ्य दिया और पांच इंद्रियों का वह अमोघ अस्त्र दिया जिससे हम स्वयं अपने प्रारब्ध को चुनौती दे सकें। प्रारब्ध: केवल एक मंच   परमात्मा किसी का भाग्य नहीं लिखता। वह तो केवल एक न्यायप्रिय विधाता है जो हमारे पूर्व संचित 'प्रारब्ध' के अनुसार हमें एक यथोचित स्थान, परिवार और शरीर देकर इस कर्मक्षेत्र में उतार देता है। प्रारब्ध वह 'कैनवस' है जो हमें मिला है, लेकिन उस पर रंग भरकर उसे 'उत्कृष्ट चित्र' बनाना या 'धब्बा', यह पूर्णतः हमारे वर्तमान कर्मों पर निर्भर है। इंद्रियाँ: कर्म के दिव्य उपकरण ईश्वर ने हमें जड़ पत्थर नहीं बनाया। उसने हमें पांच इंद्रियाँ दीं ताकि हम संसार का अनुभव करें और विव...

श्रेष्ठता का अहंकार: धर्म या विनाश का मार्ग?

"सिर्फ मेरा रास्ता ही खुदा का रास्ता है और बाकी सब वध के योग्य हैं" — क्या यह विचार किसी ईश्वरीय सत्ता का हो सकता है? या यह मनुष्य के अपने अहंकार की उपज है? आज विश्व जिस अशांति और वैमनस्य की आग में जल रहा है, उसका मूल कारण किसी धर्म की शिक्षा नहीं, बल्कि यह 'डॉक्ट्रीन' (Doctrine) है कि "मैं श्रेष्ठ हूँ और सिर्फ मैं ही श्रेष्ठ रहूँ।" जब 'स्व' का सम्मान 'दूसरे' के तिरस्कार में बदल जाता है, तो वहीं से कट्टरता का जन्म होता है। कोरे कागज़ पर नफ़रत की इबारत एक बच्चा जब जन्म लेता है, तो वह एक कोरा कागज़ होता है। उसके पास न कोई संप्रदाय होता है, न कोई शत्रु। उसे समाज, माहौल और शिक्षा यह सिखाते हैं कि उसे किसे प्रेम करना है और किससे घृणा। यदि बचपन से ही यह बीज बोया जाए कि "हमारा मत ही एकमात्र सत्य है," तो वह बच्चा बड़ा होकर सत्य का खोजी नहीं, बल्कि एक कट्टर योद्धा बनता है। सहिष्णुता (Tolerance) पर्याप्त नहीं है अक्सर हम 'सहिष्णुता' की बात करते हैं। लेकिन सहिष्णुता का अर्थ है— "मैं तुम्हें बर्दाश्त कर रहा हूँ।" सच्चा धर्म सहिष्ण...