खंडहरों में दबी गवाही और पुरातात्विक साक्ष्य
जब सदियों पुरानी लोककथाएं टीलों की खुदाई और औपनिवेशिक दस्तावेजों से टकराती हैं, तो रहस्य इतिहास का अकाट्य सत्य बन जाता है। जानिए सिरमौरी ताल के वे पुरातात्विक प्रमाण, जो सिद्ध करते हैं कि नटनी का शाप और जलप्रलय कोई कपोल-कल्पना नहीं, बल्कि एक जीवंत ऐतिहासिक त्रासदी थी!
अक्सर समय की धूल ऐतिहासिक घटनाओं पर रहस्य और किंवदंतियों का ऐसा आवरण चढ़ा देती है कि आने वाली पीढ़ियां उन्हें केवल अलाव के पास बैठकर सुनी जाने वाली लोककथा मान बैठती हैं। किंतु, सिरमौरी ताल का पतन कोई काल्पनिक परिकथा नहीं है। जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं और गिरि नदी के शांत तटों की माटी को टटोलते हैं, तो वहाँ से चीखते हुए ऐसे प्रमाण मिलते हैं जो इस गाथा की प्रामाणिकता पर मुहर लगाते हैं।
इस त्रासदी के सबसे ठोस दस्तावेजी साक्ष्य ब्रिटिश शासन के दौरान संकलित आधिकारिक गजेटियर्स में मिलते हैं। 'गजेटियर ऑफ द सिरमूर स्टेट' (1904 एवं 1934 के संस्करण) में इस घटना का स्पष्ट और गंभीर उल्लेख मिलता है। गजेटियर के अनुसार, सिरमौर रियासत की मूल और प्राचीन राजधानी गिरि नदी के तट पर 'सिरमौरी ताल' में स्थित थी, जो गिरि के विकराल जलप्रलय में रातों-रात नष्ट हो गई थी। गजेटियर में इस विनाश के मूल कारण के रूप में स्थानीय जनमानस में रची-बसी नटनी की शर्त, राजा के विश्वासघात और उसके मुख से निकले शाप को आधिकारिक संदर्भ के साथ दर्ज किया गया है।
इसके अतिरिक्त, सिरमौर के कुंवर रंजोर सिंह द्वारा 1911 के आसपास रचित ऐतिहासिक ग्रंथ 'तारीख-ए-रियासत सिरमौर' (तवारीख-ए-सिरमौर) में इस घटना का विस्तृत विवरण मिलता है। इस ग्रंथ में राजा मदन सिंह के कालखंड, नटनी द्वारा तनी हुई रस्सी पर गिरि नदी को पार करने की चुनौती, छलपूर्वक रस्सी का काटा जाना और उसके उपरांत गिरि नदी में आए जलप्रलय से पूरे नगर के दफन होने का स्पष्ट ऐतिहासिक क्रम दर्ज है।
पहाड़ी रियासतों के इतिहास के सबसे प्रामाणिक अध्येता डॉ. जे. हचिसन और जे.पी.एच. वोगेल ने अपने विश्वप्रसिद्ध शोध ग्रंथ 'History of the Panjab Hill States' (1933) के सिरमौर अध्याय में इस बात की पुष्टि की है कि ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में सिरमौर की पुरानी राजधानी का अस्तित्व समाप्त हो गया था और उसके बाद ही जैसलमेर के यदुवंशी राजवंश (राजा शुभांस प्रकाश) ने इस क्षेत्र में नए शासन की नींव रखी थी।
दस्तावेजों से आगे बढ़कर जब हम धरातल पर नजर डालते हैं, तो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और हिमाचल प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग के सर्वेक्षण अचंभित कर देते हैं:
विशाल प्राचीन ईंटें और नगर-योजना: सिरमौरी ताल के टीलों की ऊपरी सतह और कटावों में आज भी ग्यारहवीं सदी की विशिष्ट पकी हुई लाल ईंटें (Brick-bats) और चूने के गारे से जुड़ी विशाल दीवारें बिखरी मिलती हैं। यह संरचनाएं सिद्ध करती हैं कि यहाँ किसी समय सुनियोजित प्राचीर, राजमहल और सुदृढ़ घाट बने हुए थे।
नागर शैली के स्थापत्य अवशेष: क्षेत्र से प्राप्त नक्काशीदार प्रस्तर खंभे, चौखटें और मंदिरों के शीर्ष पर लगने वाले भारी आमलक यह प्रमाणित करते हैं कि यहाँ भव्य नागर शैली के देवालय विद्यमान थे, जो अचानक आई बाढ़ के मलबे में दब गए।
शिमला राज्य संग्रहालय का संग्रह: हिमाचल राज्य संग्रहालय (चौड़ा मैदान, शिमला) के मूर्तिकला और न्यूमिस्मैटिक (सिक्का) अनुभाग में सिरमौर क्षेत्र से प्राप्त मध्यकालीन प्रस्तर प्रतिमाएं और प्राचीन सिक्के आज भी सुरक्षित हैं। बलुआ पत्थर पर तराशी गई वे देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तत्कालीन उच्चस्तरीय शिल्पकला और राज्य के आर्थिक वैभव की मूक गवाही देती हैं।
स्थानीय देवालयों में सुरक्षित अवशेष: बाढ़ के थपेड़ों से बच निकले कई प्राचीन शिवलिंग और नक्काशीदार शिलाखंड आज भी कटासन देवी मंदिर परिसर तथा आसपास के ग्रामीण चबूतरों पर श्रद्धापूर्वक स्थापित हैं।
मिट्टी के नीचे दबे ये पाषाण और पन्नों में सिमटे ये शब्द एक स्वर में कहते हैं—वह वैभव भी सच था, वह छल भी सच था और गिरिगंगा का वह संहारक न्याय भी एक ऐतिहासिक यथार्थ था।
किंतु, जब इतिहास की किताबें अलमारियों में बंद हो जाती हैं, तब भी कोई उस सत्य को सीने से लगाए गाता रहता है। वह कौन है? वह है देवभूमि का लोक-हृदय!
गिरिपार के सुरों में नटनी की वह पीड़ा सदियों से कैसे तैर रही है?
जानने के लिए जुड़े रहें इस मार्मिक गाथा के अगले अंक से—
अंक 6: लोक-संस्कृति में जीवित गाथा और नाटी के बोल
✍️ - मधु शर्मा
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