"नर नाहर, अपनी शक्ति जगा, खम ठोंक, नियति को राह दिखा!
तू भाग्य-लेखक, तू ही विधाता, कर्मों की स्याही से गाथा गा!"
क्या आपने कभी सोचा है कि जिसे हम 'भाग्य' कहकर हार मान लेते हैं, क्या वह वास्तव में ईश्वर द्वारा लिखित कोई अटल दस्तावेज है? क्या परमात्मा ने हमें केवल परिस्थितियों का दास बनने के लिए इस नश्वर संसार में भेजा है? कदापि नहीं! ईश्वर ने हमें दृष्टि दी, सामर्थ्य दिया और पांच इंद्रियों का वह अमोघ अस्त्र दिया जिससे हम स्वयं अपने प्रारब्ध को चुनौती दे सकें।
प्रारब्ध: केवल एक मंच
परमात्मा किसी का भाग्य नहीं लिखता। वह तो केवल एक न्यायप्रिय विधाता है जो हमारे पूर्व संचित 'प्रारब्ध' के अनुसार हमें एक यथोचित स्थान, परिवार और शरीर देकर इस कर्मक्षेत्र में उतार देता है। प्रारब्ध वह 'कैनवस' है जो हमें मिला है, लेकिन उस पर रंग भरकर उसे 'उत्कृष्ट चित्र' बनाना या 'धब्बा', यह पूर्णतः हमारे वर्तमान कर्मों पर निर्भर है।
इंद्रियाँ: कर्म के दिव्य उपकरण
ईश्वर ने हमें जड़ पत्थर नहीं बनाया। उसने हमें पांच इंद्रियाँ दीं ताकि हम संसार का अनुभव करें और विवेक दिया ताकि हम सही दिशा का चुनाव करें। ये इंद्रियाँ केवल भोग के लिए नहीं, बल्कि भाग्य-लेखन की 'कलम' हैं। यदि हम आलस्य त्याग कर अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाएं, तो हम उन रेखाओं को भी बदल सकते हैं जिन्हें दुनिया 'अमिट' कहती है।
पुरुषार्थ का उद्घोष:
जब मनुष्य अपने पुरुषार्थ पर उतर आता है, तो नियति को भी झुकना पड़ता है। जैसा कि राष्ट्रकवि दिनकर ने रश्मिरथी में सिंहनाद किया है:
"है कौन विघ्न ऐसा जग में, टिक सके वीर नर के मग में?
खम ठोंक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पाँव उखड़।"
भाग्य के भरोसे बैठना कायरता है। सच्चा वीर वह है जो जानता है कि उसकी भुजाओं में वह बल है कि वह समय की धारा को मोड़ दे। ईश्वर केवल ऊर्जा का स्रोत है, उस ऊर्जा को सफलता के 'भाग्य' में रूपांतरित करना हमारा उत्तरदायित्व है।
निष्कर्ष:
मनुष्य अपने कर्मों का स्वयं रचयिता है। आइये, अपनी इंद्रियों का संयम और सदुपयोग करें और 'VedaRicha' के इस चिंतन को जीवन में उतारें कि हम नियति के खिलौने नहीं, बल्कि अपने भविष्य के शिल्पकार हैं। याद रखिये:
"वसुधा का नेता कौन हुआ? भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?
अतुलित यश-क्रेता कौन हुआ? नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?
जिसने न कभी आराम किया, विघ्नों में रहकर काम किया।"
✍️ — मधु शर्मा (VedaRicha)
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