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श्रेष्ठता का अहंकार: धर्म या विनाश का मार्ग?

"सिर्फ मेरा रास्ता ही खुदा का रास्ता है और बाकी सब वध के योग्य हैं" — क्या यह विचार किसी ईश्वरीय सत्ता का हो सकता है? या यह मनुष्य के अपने अहंकार की उपज है?

आज विश्व जिस अशांति और वैमनस्य की आग में जल रहा है, उसका मूल कारण किसी धर्म की शिक्षा नहीं, बल्कि यह 'डॉक्ट्रीन' (Doctrine) है कि "मैं श्रेष्ठ हूँ और सिर्फ मैं ही श्रेष्ठ रहूँ।" जब 'स्व' का सम्मान 'दूसरे' के तिरस्कार में बदल जाता है, तो वहीं से कट्टरता का जन्म होता है।

कोरे कागज़ पर नफ़रत की इबारत

एक बच्चा जब जन्म लेता है, तो वह एक कोरा कागज़ होता है। उसके पास न कोई संप्रदाय होता है, न कोई शत्रु। उसे समाज, माहौल और शिक्षा यह सिखाते हैं कि उसे किसे प्रेम करना है और किससे घृणा। यदि बचपन से ही यह बीज बोया जाए कि "हमारा मत ही एकमात्र सत्य है," तो वह बच्चा बड़ा होकर सत्य का खोजी नहीं, बल्कि एक कट्टर योद्धा बनता है।


सहिष्णुता (Tolerance) पर्याप्त नहीं है

अक्सर हम 'सहिष्णुता' की बात करते हैं। लेकिन सहिष्णुता का अर्थ है— "मैं तुम्हें बर्दाश्त कर रहा हूँ।" सच्चा धर्म सहिष्णुता से कहीं ऊपर 'स्वीकार्यता' (Acceptance) में है। स्वीकार्यता का अर्थ है— "मैं तुम्हारा सम्मान करता हूँ, क्योंकि तुम भी उसी एक सत्य की खोज में हो, जिसमें मैं हूँ।"

अहंकार बनाम अध्यात्म

संप्रदाय अक्सर दीवारें खड़ी करते हैं, जबकि अध्यात्म पुल बनाता है। जब तक हम स्वयं को ही सत्य का पर्याय मानकर 'जड़ता के पाश' में बंधे रहेंगे, तब तक हम उस अनंत परमात्मा को नहीं समझ पाएंगे। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक अनिवार्य जीवन पद्धति है।

एक ओजस्वी आह्वान (कविता)

"जन्मता नहीं कोई मनुज हाथ में तलवार लेकर,
न ही आता है हृदय में मरुस्थल की धार लेकर।


समाज ही उसे विषैले घूँट पिलाता है,
कोरे कागज़ पर नफ़रत की लकीरें खींच जाता है।


जो 'स्वयं' को ही सत्य का पर्याय मान बैठा,
समझो कि वह जड़ता के पाश में खुद को बाँध बैठा।


श्रेष्ठता का दम्भ ही मानवता का काल है,
'सिर्फ मैं ही सही हूँ', यही सबसे बड़ा जाल है।"

बदलाव का मार्ग: ऋग्वेद की दृष्टि

हमारे पूर्वजों ने हमें "संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्" का मंत्र दिया। इसका अर्थ है— हम साथ चलें, साथ बोलें और हमारे मन एक समान होकर सत्य को जानें।




बदलाव तब आएगा जब हम बच्चों को 'मत' नहीं, 'विवेक' सिखाएंगे। जब हम 'श्रेष्ठता' के स्थान पर 'विविधता' का उत्सव मनाएंगे। याद रखिए, सूरज की किरणें किसी के मत को देखकर उसके आँगन में नहीं उतरतीं, वे सबके लिए समान हैं। तो फिर हम क्यों नहीं?


✍️— मधु शर्मा (VedaRicha)


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टिप्पणियाँ

  1. अक्सर संप्रदायों में यह सिखाया जाता है कि यदि तुम हमारे मार्ग से भटके, तो तुम्हें 'नरक' या 'ईश्वरीय दंड' मिलेगा। यह भय ही उसे दूसरे मतों के प्रति अनुदार (Intolerant) बना देता है। वह अपनी श्रेष्ठता इसलिए सिद्ध करना चाहता है ताकि उसका अपना 'अस्तित्व' सुरक्षित रहे।

    आज विश्व जिस अशांति से जूझ रहा है, उसका मूल कारण "सिर्फ मेरा रास्ता ही खुदा का रास्ता है" वाली संकीर्ण सोच है। जब तक हम 'मैं' से ऊपर उठकर 'हम' को नहीं अपनाते, शांति असंभव है।

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