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मार्च, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भाग्य का विधाता: स्वयं मनुष्य (प्रारब्ध, पुरुषार्थ और हमारी पांच इंद्रियां)

" नर नाहर, अपनी शक्ति जगा, खम ठोंक, नियति को राह दिखा! तू भाग्य-लेखक, तू ही विधाता, कर्मों की स्याही से गाथा गा!" क्या आपने कभी सोचा है कि जिसे हम 'भाग्य' कहकर हार मान लेते हैं, क्या वह वास्तव में ईश्वर द्वारा लिखित कोई अटल दस्तावेज है? क्या परमात्मा ने हमें केवल परिस्थितियों का दास बनने के लिए इस नश्वर संसार में भेजा है? कदापि नहीं! ईश्वर ने हमें दृष्टि दी, सामर्थ्य दिया और पांच इंद्रियों का वह अमोघ अस्त्र दिया जिससे हम स्वयं अपने प्रारब्ध को चुनौती दे सकें। प्रारब्ध: केवल एक मंच   परमात्मा किसी का भाग्य नहीं लिखता। वह तो केवल एक न्यायप्रिय विधाता है जो हमारे पूर्व संचित 'प्रारब्ध' के अनुसार हमें एक यथोचित स्थान, परिवार और शरीर देकर इस कर्मक्षेत्र में उतार देता है। प्रारब्ध वह 'कैनवस' है जो हमें मिला है, लेकिन उस पर रंग भरकर उसे 'उत्कृष्ट चित्र' बनाना या 'धब्बा', यह पूर्णतः हमारे वर्तमान कर्मों पर निर्भर है। इंद्रियाँ: कर्म के दिव्य उपकरण ईश्वर ने हमें जड़ पत्थर नहीं बनाया। उसने हमें पांच इंद्रियाँ दीं ताकि हम संसार का अनुभव करें और विव...

युवा चेतना का अवसान: आधुनिकता के छद्म जाल में सिसकती मर्यादा

 आज का समाज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ प्रगति की चकाचौंध तो है, पर संस्कार का प्रकाश लुप्तप्राय है। विडंबना देखिए कि जिस युवा शक्ति के कंधों पर राष्ट्र के नवनिर्माण का भार था, वही आज 'स्वतंत्रता' के नाम पर परोसी जा रही 'मानसिक दासता' का शिकार हो चुकी है। समाज दिशाहीनता के उस भंवर में है, जहाँ कुरीतियों ने अपने अदृश्य पर बहुत गहरे जाल फैला दिए हैं। १. कुरीतियों का सूक्ष्म प्रहार और विवेक का अंत आज की कुरीतियां पुरानी रूढ़ियों जैसी नहीं हैं जो दूर से पहचानी जा सकें; ये आधुनिकता का चोला पहनकर आती हैं। सोशल मीडिया के 'ट्रेंड्स', 'लाइक' की भूख और वर्चुअल दुनिया की कृत्रिमता—ये दिखने में बहुत छोटी और निर्दोष लगती हैं, लेकिन इनका प्रभाव हमारे आज्ञाकारी युवाओं के मस्तिष्क पर इतना गहरा है कि उनका अपना मौलिक 'विवेक' मर चुका है। युवा अब वह नहीं सोचता जो सही है, वह वही करता है जो 'दिखाया' जा रहा है। २ . चरित्रहीनता और अमर्यादित आचरण का उत्सव मर्यादा, जो कभी भारतीय संस्कृति का आभूषण थी, उसे आज 'पिछड़ापन' घोषित कर दिया गया है। बड़ों का अनाद...

गौ: सनातन का प्राण और वैज्ञानिक अमृत

  1. गाय को 'माता' क्यों कहा गया? सनातन धर्म में देसी गाय को 'पशु' की श्रेणी में कभी रखा ही नहीं गया। उसे 'माता' का दर्जा दिया गया है क्योंकि जिस प्रकार एक माँ अपने संतान को बिना किसी स्वार्थ के केवल पोषण देती है, ठीक वैसे ही गाय अपने दूध, घी, मूत्र और गोबर से पूरी मानवता का पालन करती है। सनातन धर्म में गाय को ' गावो विश्वस्य मातरः' यानी 'गाय विश्व की माता है' कहा गया है। यह केवल एक भावनात्मक कथन नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तर्क है। शास्त्रों के अनुसार, गाय के शरीर में 33 कोटि देवताओं का वास है, जिसका अर्थ है कि वह ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एक जीवंत पुंज है। वह केवल दूध नहीं देती, वह संस्कार और सात्विकता का संचार करती है। 2. हमारे जीवन में उपयोग और सनातन से अटूट संबंध गाय और सनातन धर्म एक-दूसरे के पूरक हैं। पंचगव्य का महत्व: दूध, दही, घी, गो-मूत्र और गोबर—इन पाँच तत्वों के बिना कोई भी वैदिक अनुष्ठान, पूजा या शुद्धि कर्म पूर्ण नहीं माना जाता। कृषि और अर्थव्यवस्था : भारत की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था का आधार 'नंदी' और '...

नेहरू काल और सांस्कृतिक आघात: पंचांग से लेकर हिंदू कोड बिल तक का 'काला सच'

किसी भी राष्ट्र की जीवंतता उसकी जड़ों और उसकी प्राचीन संस्कृति में निहित होती है। लेकिन स्वतंत्र भारत के शुरुआती दशकों में, आधुनिकता और 'धर्मनिरपेक्षता' के नाम पर जिस तरह से भारत की सनातन परंपराओं पर प्रहार किया गया, वह आज के जागरूक समाज के लिए एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। क्या वह सुधार था या भारत की आत्मा को मिटाने की एक सोची-समझी साजिश? 1 . 22 मार्च 1957: भारतीय पंचांग के साथ 'विदेशी' मिलावट: 22 मार्च 1957 का दिन भारतीय इतिहास में एक ऐसे मोड़ के रूप में याद किया जाएगा, जब भारत की वैज्ञानिक गणना वाली काल-निर्धारण पद्धति (विक्रम संवत) की उपेक्षा कर 'शक संवत' को राष्ट्रीय पंचांग घोषित किया गया और साथ में विदेशी 'ग्रेगोरियन कैलेंडर' को प्रशासनिक कार्यों पर थोप दिया गया। साजिश का पहलू : हज़ारों वर्षों से भारत के ऋषि-मुनियों ने नक्षत्रों और सौर-चंद्र गतियों के आधार पर जो सटीक गणना की थी, उसे 'अवैज्ञानिक' या 'पिछड़ा' बताकर किनारे कर दिया गया। एक ऐसे देश में जहाँ हर त्यौहार और खेती की पद्धति पंचांग से जुड़ी थी, वहाँ विदेशी कैलेंडर थोपना सांस्कृतिक वि...

भिक्षा: पुण्य या पुरुषार्थ का गला घोंटने वाला अभिशाप?

एक कर्मयोगी की टूटी आस शहर की गलियों में एक मोटरसाइकिल पर गैस चूल्हे और कुकर ठीक करने वाला व्यक्ति जब सुबह निकलता था, तो उसके माथे पर पसीने की बूंदें उसके 'स्वाभिमान' की चमक होती थीं। दिन भर की भागदौड़, काले होते हाथ और ₹5-₹10 के लिए ग्राहकों से होती बहस के बाद वह शाम को ₹300 लेकर घर लौटता था। लेकिन, एक दिन शहर की एक 'लाल बत्ती' ने उसका जीवन दर्शन हिला दिया। उसने देखा कि उसी सड़क पर खड़ा एक भिखारी, बिना किसी हुनर, बिना किसी औजार और बिना किसी पसीने के, केवल हाथ फैलाकर दिन भर में ₹1000 से ₹1200 बटोर रहा है। चिंतन का प्रश्न: क्या परिश्रम से भीख माँगना श्रेष्ठ है? यहीं से एक विचलित करने वाला प्रश्न जन्म लेता है। समाज की विडंबना देखिए—हम उस श्रमिक से कुकर ठीक कराने पर ₹10 कम कराने के लिए सौदेबाजी करते हैं, लेकिन उसी सिग्नल पर किसी याचक को ₹10 का सिक्का 'पुण्य' समझकर थमा देते हैं। क्या हमारा समाज केवल लाचारी को पहचानता है, पुरुषार्थ को नहीं? विद्रूपता: जहाँ 'श्वानों' का मूल्य मनुष्य से अधिक है। आज के भौतिकवादी युग में संसाधनों से सम्मान तय होता है। धनाढ्य परिव...

प्रकृति का क्रंदन और आधुनिकता का भ्रम

आज का समाज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ 'प्रगति' की परिभाषा ही बदल गई है। युवतियों का विवाह और परिवार से दूरी बनाकर केवल कैरियर पर ध्यान केंद्रित करना, पहली नज़र में 'सशक्तिकरण' लग सकता है, लेकिन गहराई से देखने पर यह प्राकृतिक संतुलन के साथ एक भयानक खिलवाड़ है। 1. स्त्री: जगत की 'सृजन शक्ति' अध्यात्म और विज्ञान, दोनों इस बात को स्वीकार करते हैं कि स्त्री 'शक्ति' का वो स्वरूप है—जो सृजन करती है, और जीवन को विस्तार देती है।   भटकाव : आज की युवती विवाह को 'झंझट' और परिवार को 'बोझ' समझने लगी है। वह पुरुष के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की चाह में अपनी उस विशिष्ट गरिमा को खो रही है, जो केवल उसके पास ही है।  असंतुलन : जब सृजन का स्रोत ही सूखने लगेगा या वह अपनी दिशा बदल लेगा, तो आने वाली पीढ़ियां संस्कारविहीन और भावनात्मक रूप से रिक्त होंगी। पुरुष की भूमिका संघर्ष और सुरक्षा की है, लेकिन स्त्री की भूमिका 'आधार' और 'सृजन' की है। यदि आधार ही खिसक गया, तो समाज की इमारत ढह जाएगी। 2. डरावने आंकड़े और वर्तमान स्थिति अंतरराष्ट्रीय सर्वे ...

कर्म की निष्ठा और नियति का न्याय: गबरू किसान की एक व्यथा

                            " फसल गिरी है, हौसला नहीं।" जीवन के रंगमंच पर हम सभी अपने-अपने हिस्से का अभिनय करते हैं। गबरू किसान ने भी वही किया—पूरी निष्ठा, पसीने की बूंदों और शुद्ध ऑर्गेनिक खाद से उसने मिट्टी को सींचा। उसकी लहलहाती फसलें इस बात का प्रमाण थीं कि 'कर्म' कभी व्यर्थ नहीं जाता। लेकिन तभी प्रकृति का एक क्रूर प्रहार होता है, और पकी हुई सुनहरी फसल ओलावृष्टि की भेंट चढ़ जाती है। यहाँ एक यक्ष प्रश्न खड़ा होता है: क्या कर्म ही सब कुछ है, या भाग्य का पलड़ा भारी है? 1. कर्म: जो हमारे हाथ में है गबरू ने जुताई की, खाद डाली और देखभाल की। यह उसका अधिकार क्षेत्र था। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन—अर्थात हमारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं। गबरू का संतोष उसकी मेहनत में था, जो उसने पूरी ईमानदारी से निभाई। कर्म हमें पुरुषार्थ की शक्ति देता है और आत्म-सम्मान से भरता है। 2. भाग्य: जो हमारे नियंत्रण से बाहर है बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि गबरू के नियंत्रण में नहीं थी। इसे हम 'नियति' या 'परि...

अहंकार की हार और आस्था की जीत – संत मलूक दास की कहानी

सिहांसन हिल उठे, पर न डिगी अटल वो टेक, भूख से बेहाल, पर न झुका वो भाल एक। अनहद नाद गूँजा, जब मौन ने ली अँगड़ाई, तब 'अजगर' सी हठ देख, विधाता ने राह बनाई॥ महात्मा मलूक दास जी के मन में एक बार एक 'हठ' पैदा हुई। उन्होंने सोचा, "क्या ईश्वर वास्तव में कण-कण में व्याप्त है? क्या वह हर परिस्थिति में अपने भक्त को ढूंढ सकता है?" उन्होंने भगवान की इस सर्वव्यापकता और पालनहार शक्ति को परखने का निर्णय लिया। वे एक वीरान जंगल में गए और एक ऊँचे बरगद के पेड़ पर जाकर छिप गए। शर्त ये थी, " न मैं हाथ हिलाऊंगा, न मुँह खोलूंगा। देखूं तू खिलाता कैसे है!" शाम हुई... भूख से शरीर टूटने लगा, पर मलूक दास जी अडिग थे। तभी अचानक, परिस्थितियों ने एक नया मोड़ लिया। राजा का काफिला आया, छप्पन भोग सजे, पर नियति देखिए... डाकुओं के डर से वे सब खाना छोड़कर भाग निकले। अब नीचे भगवान का प्रसाद सजा था, पर मलूक दास जी की जिद अब भी बरकरार थी। तभी वहां 'मौत' का दूसरा नाम यानी खूंखार डाकू आ धमके। मलूक दास जी बरगद की ऊँची डाल पर दुबके बैठे थे, और नीचे छप्पन भोग की महक हवाओं में तैर रही थी। ...

श्रेष्ठता का अहंकार: धर्म या विनाश का मार्ग?

"सिर्फ मेरा रास्ता ही खुदा का रास्ता है और बाकी सब वध के योग्य हैं" — क्या यह विचार किसी ईश्वरीय सत्ता का हो सकता है? या यह मनुष्य के अपने अहंकार की उपज है? आज विश्व जिस अशांति और वैमनस्य की आग में जल रहा है, उसका मूल कारण किसी धर्म की शिक्षा नहीं, बल्कि यह 'डॉक्ट्रीन' (Doctrine) है कि "मैं श्रेष्ठ हूँ और सिर्फ मैं ही श्रेष्ठ रहूँ।" जब 'स्व' का सम्मान 'दूसरे' के तिरस्कार में बदल जाता है, तो वहीं से कट्टरता का जन्म होता है। कोरे कागज़ पर नफ़रत की इबारत एक बच्चा जब जन्म लेता है, तो वह एक कोरा कागज़ होता है। उसके पास न कोई संप्रदाय होता है, न कोई शत्रु। उसे समाज, माहौल और शिक्षा यह सिखाते हैं कि उसे किसे प्रेम करना है और किससे घृणा। यदि बचपन से ही यह बीज बोया जाए कि "हमारा मत ही एकमात्र सत्य है," तो वह बच्चा बड़ा होकर सत्य का खोजी नहीं, बल्कि एक कट्टर योद्धा बनता है। सहिष्णुता (Tolerance) पर्याप्त नहीं है अक्सर हम 'सहिष्णुता' की बात करते हैं। लेकिन सहिष्णुता का अर्थ है— "मैं तुम्हें बर्दाश्त कर रहा हूँ।" सच्चा धर्म सहिष्ण...

प्रतिभा की 'न्यायिक हत्या': डॉ. वैभव जैन और तंत्र का षड्यंत्र

  " समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।"  — रामधारी सिंह 'दिनकर' एक मेधावी का 'अपराध' और प्रतिशोध की ज्वाला: वर्ष 2012, इंदौर मेडिकल कॉलेज। डॉ. वैभव जैन, एक ऐसा छात्र जिसकी आँखों में सुनहरे भविष्य के सपने थे। उनका 'गुनाह' केवल इतना था कि उन्होंने अपनी सहपाठी नेहा वर्मा की उस अनैतिक मांग को ठुकरा दिया, जिसमें उन्हें अपनी बहन की जगह बैठकर प्रवेश परीक्षा में नकल करवानी थी। सत्य पर अडिग रहने का दंड क्या मिला? एक सुनियोजित षड्यंत्र! कानून जब 'कसाई' बन गया: नेहा ने वैभव के नाम से एक फर्जी फेसबुक प्रोफाइल बनाई, उस पर अश्लील सामग्री डाली और फिर भारत के सबसे खतरनाक हथियार—SC/ST Act—का उपयोग किया। बिना किसी प्राथमिक जांच के, बिना डिजिटल साक्ष्यों की पुष्टि किए, पुलिस ने वैभव को दबोच लिया। (चित्र [image_12.png] में जंजीरों पर "SC/ST Act" की तख्ती इसी भयावहता को दर्शाती है।) मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की पराकाष्ठा: 50 दिन की कालकोठरी : एक डॉक्टर बनने का सपना देखने वाला युवक अपराधियों के बीच सड़ने को मज...

भगवती वंदना और नूतन वर्ष शुभकामना

  जयति जय जय माँ जगदम्बा, दुःख-दारिद्र्य विनाशिनी। शुभ्रवसना सुहासिनी, जन-मन-सिंहासन वासिनी॥ कर जोड़ि "मधु" वंदन करे, भक्ति-भाव उर धारि के। तव शरण माँ मोहि राखियो, हरहु सब कष्ट निवारि के॥ चैत्र नवरात्रि पुनीत बेला, सजे घर-घर माँ के द्वार। शक्ति स्वरूपा सिद्धिदात्री, करहु सब पर कृपा अपार॥ नूतन संवत्सर हो मंगल, हर्षित हो अब सकल जहान। सुख-समृद्धि वैभव बढ़े, मान-सम्मान बढ़े कीर्ति महान॥ "मधु शर्मा" की ओर से आप सभी को, चैत्र नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं। और नूतन वर्ष मंगलमय हो! ✍️ — मधु शर्मा #हिंदू_नव_वर्ष #VedaRicha_ #सनातन_वैदिक_धर्म #चैत्र_नवरात्रि #विक्रम_संवत_2083 #रौद्र_संवत्सर

नव-संवत्सर २०८३: चैत्र नवरात्रि पर्व

उठो धरा के वीर सुतों, देखो नव वर्ष आया है, तरु-पल्लव ने केसरिया बाना, अंग-अंग सजाया है। नई कोपलों की लाली में, छिपी सूर्य की ऊष्मा है, फलों-फूलों के वैभव में, धरती बनी सगुप्मा है! खेतों में जो लहरातीं फसलें, वह स्वर्णमयी श्रृंगार हैं, झूम रही प्रकृति पाकर, ऋतुराज का अलंकार है। नन्हे खग का कलरव देखो, जैसे बजती भेरी हो, नवल वर्ष की बेला में, अब तनिक न कोई देरी हो! चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा, गुरुवार का वह स्वर्ण-क्षण, उन्नीस मार्च की भोर में सजा, नवल वर्ष का अभिनंदन। रौद्र नाम संवत्सर का, तेरह मासों की माया है, पुरुषोत्तम का अधिक मास, इस वर्ष धरा पर आया है! और देखो, नभ से उतरी, जगदम्बा की सत्ता है, नारी-शक्ति के चरणों में, झुकता हर इक पत्ता है। भक्ति और शक्ति का यह, पावन मेल निराला है, नवरात्रि के दीपों ने, मन का तिमिर निकाला है! विक्रम संवत की विजय-ध्वजा, अंबर तक फहराने दो, हिन्दू नव-उत्कर्ष का पावन, शंखनाद हो  जाने दो। नमन करो उस महाशक्ति को, जो सृष्टि का आधार है, प्रसन्नता के इस उत्सव में, रचा-बसा संसार है! मधु शर्मा की ओर से आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

स्वतंत्रता का भ्रम या पहचान का अंत? : रिद्धि और मोनालिसा की दास्ताँ

आज के आधुनिक युग में 'स्वच्छंदता' और 'व्यक्तिगत पसंद' के नाम पर अक्सर अपनी जड़ों को काटने की होड़ मची है। लेकिन क्या यह तथाकथित आधुनिकता हमें सुरक्षा और सम्मान की ओर ले जा रही है, या फिर एक ऐसे अंधेरे की ओर जहाँ पहुँचकर व्यक्ति का अपना सामाजिक और पारिवारिक अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है? आज का यह लेख दो ऐसी ही घटनाओं पर आधारित है जो समाज की आँखें खोलने के लिए पर्याप्त हैं। रिद्धि जाधव: पंख काटकर पिंजरे का चुनाव? इंडिगो एयरलाइंस की पूर्व एयरहोस्टेस रिद्धि जाधव, जो कभी खुले आसमान में उड़ती थीं और अपनी आधुनिक जीवनशैली के लिए जानी जाती थीं, आज 'आयशा शेख' के रूप में अपनी पहचान खो चुकी हैं। जो युवती कभी अपनी मर्जी के पहनावे और स्वच्छंद विचारों के साथ दुनिया के सामने आती थी, वह आज बुर्के की काली परतों में सिमट गई है। यह केवल एक विवाह नहीं, बल्कि एक पूरी जीवनशैली और विचारधारा का पूर्ण आत्मसमर्पण है। जिस सनातन की उदारता को ठुकराकर उन्होंने इस जकड़न को चुना, क्या आज वह अपनी उस 'आधुनिक' छवि को याद कर पाती होंगी? जब बच्चा भी उसी कट्टरता के सांचे में ढलने लगता है, तब प्रश...

श्रीमद्भगवद्गीता: काव्य सार प्रथम अध्याय: अर्जुनविषादयोग

  ॐ  अथ श्री। श्री गणेशाय नमः। धृतराष्ट्र उवाच: धृतराष्ट्र पूछे संजय से, हो व्याकुलता से त्रस्त, धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में भाग्य किसका उदय और अस्त, पांडु-पुत्र और मेरे सुत, रण की इच्छा लिए खड़े, कुरुक्षेत्र की उस माटी पर, कौन-कौन से वीर अड़े?" संजय उवाच : संजय बोले, "हे राजन! रणभेरी अब बज उठी प्रचंड, एक ओर अधर्म खड़ा, दूजी ओर सत्य का ध्वज अखंड। भीष्म, द्रोण और कृप खड़े, कौरव की शक्ति का मान, पर पांडव दल के रक्षक हैं, स्वयं कृष्ण भगवान।" कुरुक्षेत्र की रणभूमि में, बज उठे थे रण के शंख, देख सम्मुख बंधु-बांधव, कैसे सहूंगा इनके वध का कलंक। एक ओर था धर्म खड़ा, दूजी ओर मोह का जाल, पार्थ के हाथ से छूटा गांडीव, देख अपनों का ही काल। अर्जुन उवाच: हे केशव! सम्मुख खड़े, सब मेरे ही मान। तात, भ्राता और गुरुवर, जिनसे मेरी पहचान॥ विजय मिले या राज्य मिले, क्या मूल्य उस जीत का? अपनों के ही रक्त से सिंचित, क्या अर्थ ऐसी धरा की प्रीत का? थर-थर कांपे गात वीर के, मुख भी उसका सूख गया, रण का धीर, धनुर्धर आज, मोह के आगे झुक गया। बीच रणभूमि खड़ा हुआ, गांडीवधारी का रथ महान, सारथी बने स्वयं जगदीश्...

ऋण की वसूली या अंतिम विदाई? एक माँ की पुकार और संसार की नश्वरता

 संसार एक रंगमंच है, जहाँ हम सब अपनी भूमिका निभाने आते हैं। लेकिन कभी-कभी कुछ भूमिकाएँ इतनी कठिन होती हैं कि वे हमें जीवन के असली अर्थ और 'परम शक्ति' के अस्तित्व का साक्षात्कार करा देती हैं। हाल ही में गाजियाबाद के हरीश राणा का प्रसंग और उनकी माँ का वह विदाई वीडियो देखकर मन में एक गहरा वैराग्य उत्पन्न हुआ है।  विज्ञान की हार, प्रारब्ध की जीत   हम अहंकार में कहते हैं कि "मैं कर लूँगा", "मैं बचा लूँगा"। विज्ञान ने मशीनें बनाईं, कानून ने नियम बनाए, लेकिन 13 वर्षों तक कोमा (PVS) में पड़े उस युवक के प्राणों पर किसी का वश नहीं चला। जब विधाता की डोर खिंचती है, तो बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ और संचित धन-दौलत धरे के धरे रह जाते हैं। क्या यह विज्ञान की हार नहीं? क्या यह उस ईश्वर की इच्छा का प्रमाण नहीं कि साँसें देना और लेना केवल उसी के हाथ में है?   ऋण का लेन-देन:  एक मर्मस्पर्शी सत्य इस प्रसंग को देख ऐसा प्रतीत होता है मानो यह पिछले जन्म का कोई गहरा 'लेन-देन' था। माता-पिता ने अपनी पूरी कमाई, अपनी रातों की नींद और अपने जीवन के 13 बहुमूल्य वर्ष उस बच्चे पर न्योछावर ...