" नर नाहर, अपनी शक्ति जगा, खम ठोंक, नियति को राह दिखा! तू भाग्य-लेखक, तू ही विधाता, कर्मों की स्याही से गाथा गा!" क्या आपने कभी सोचा है कि जिसे हम 'भाग्य' कहकर हार मान लेते हैं, क्या वह वास्तव में ईश्वर द्वारा लिखित कोई अटल दस्तावेज है? क्या परमात्मा ने हमें केवल परिस्थितियों का दास बनने के लिए इस नश्वर संसार में भेजा है? कदापि नहीं! ईश्वर ने हमें दृष्टि दी, सामर्थ्य दिया और पांच इंद्रियों का वह अमोघ अस्त्र दिया जिससे हम स्वयं अपने प्रारब्ध को चुनौती दे सकें। प्रारब्ध: केवल एक मंच परमात्मा किसी का भाग्य नहीं लिखता। वह तो केवल एक न्यायप्रिय विधाता है जो हमारे पूर्व संचित 'प्रारब्ध' के अनुसार हमें एक यथोचित स्थान, परिवार और शरीर देकर इस कर्मक्षेत्र में उतार देता है। प्रारब्ध वह 'कैनवस' है जो हमें मिला है, लेकिन उस पर रंग भरकर उसे 'उत्कृष्ट चित्र' बनाना या 'धब्बा', यह पूर्णतः हमारे वर्तमान कर्मों पर निर्भर है। इंद्रियाँ: कर्म के दिव्य उपकरण ईश्वर ने हमें जड़ पत्थर नहीं बनाया। उसने हमें पांच इंद्रियाँ दीं ताकि हम संसार का अनुभव करें और विव...
वेदऋचा: जहाँ साहित्य की ओज, संवेदना की गहराई और कृष्ण भक्ति का संगम होता है। मधु की डायरी के कुछ अनछुए पन्ने।