महात्मा मलूक दास जी के मन में एक बार एक 'हठ' पैदा हुई। उन्होंने सोचा, "क्या ईश्वर वास्तव में कण-कण में व्याप्त है? क्या वह हर परिस्थिति में अपने भक्त को ढूंढ सकता है?" उन्होंने भगवान की इस सर्वव्यापकता और पालनहार शक्ति को परखने का निर्णय लिया।
वे एक वीरान जंगल में गए और एक ऊँचे बरगद के पेड़ पर जाकर छिप गए। शर्त ये थी, "न मैं हाथ हिलाऊंगा, न मुँह खोलूंगा। देखूं तू खिलाता कैसे है!"
शाम हुई... भूख से शरीर टूटने लगा, पर मलूक दास जी अडिग थे। तभी अचानक, परिस्थितियों ने एक नया मोड़ लिया। राजा का काफिला आया, छप्पन भोग सजे, पर नियति देखिए... डाकुओं के डर से वे सब खाना छोड़कर भाग निकले।
अब नीचे भगवान का प्रसाद सजा था, पर मलूक दास जी की जिद अब भी बरकरार थी। तभी वहां 'मौत' का दूसरा नाम यानी खूंखार डाकू आ धमके।
मलूक दास जी बरगद की ऊँची डाल पर दुबके बैठे थे, और नीचे छप्पन भोग की महक हवाओं में तैर रही थी। तभी झाड़ियों के पीछे से खूंखार डाकुओं का एक गिरोह निकला। उनकी तलवारें चमक रही थीं। जब उन्होंने निर्जन जंगल में सोने-चाँदी के बर्तनों में सजा राजसी खाना देखा, तो वे ठिठक गए।
सरदार ने गरजकर कहा, "रुको! यह कोई चाल लगती है। इस वीरान जंगल में इतना कीमती खाना..? और कोई इंसान नहीं? पक्का इसमें जहर मिलाया गया है ताकि हमें मारकर हमारा माल लूटा जा सके।"
तभी एक डाकू की नजर ऊपर बरगद के घने पत्तों पर पड़ी। उसने चिल्लाकर कहा, "सरदार! ऊपर देखो, कोई छिपा है! जरूर इसी ने यह जाल बिछाया है।"
डाकुओं ने मलूक दास जी को नीचे उतारा। वे भूख से निढाल थे, चेहरा पीला पड़ चुका था, लेकिन आँखों में वही 'हठ' और ईश्वर को आजमाने की चमक थी। सरदार ने मलूक दास की गर्दन पर नंगी तलवार रख दी और दहाड़कर बोला:
"ए ढोंगी! सच बता, इस खाने में जहर है न? तू चाहता है कि हम इसे खाएं और मर जाएं? अब देख, तू ही इस खाने को पहले खाएगा। अगर तूने मना किया, तो इसी पल तेरा सिर धड़ से अलग कर दूँगा!"
मलूक दास जी मन ही मन मुस्कुराए। उनकी शर्त थी— "न हाथ हिलाऊंगा, न मुँह खोलूंगा।"
उन्होंने अपना मुँह बंद कर लिया और गर्दन झुका ली। यह देख डाकू और भड़क गए। उन्हें लगा कि मलूक दास मरने से डर रहा है क्योंकि खाने में वाकई जहर है। सरदार ने अपने दो गुर्गों को हुक्म दिया, "इसका मुँह जबरदस्ती खोलो और इसके गले के नीचे यह खाना उतारो!"
अगले ही पल, दो बलवान डाकुओं ने मलूक दास जी के हाथ पकड़े, एक ने उनका जबड़ा जबरदस्ती खोला और तीसरा शख्स बड़े-बड़े ग्रास उनके मुँह में ठूंसने लगा। मलूक दास जी हिल भी नहीं रहे थे, और डाकू उन्हें 'सजा' देने के लिए जबरन खिला रहे थे।
जब मलूक दास जी का पेट भर गया, तब उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े। उन्होंने ऊपर आसमान की ओर देखा और दिल ही दिल में कहा:
"वाह रे मेरे मालिक! क्या गजब का इंतजाम है। मैं हाथ नहीं उठाना चाहता था, तो तूने डाकुओं को मेरा हाथ पकड़ने पर मजबूर कर दिया। मैं मुँह नहीं खोलना चाहता था, तो तूने मौत का डर दिखाकर मेरा मुँह खुलवा दिया। तू खिलाता भी है, और खिलाने के लिए 'नौकर' भी भेजता है!"
इस घटना ने साबित कर दिया कि जब इंसान अपना अहंकार त्याग कर ईश्वर पर अटूट विश्वास करता है, तो पूरी सृष्टि उसकी मदद करती है।
निष्कर्ष (Conclusion):
संत मलूक दास जी की यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा विश्वास कभी व्यर्थ नहीं जाता। ईश्वर हर परिस्थिति में अपने भक्तों का ध्यान रखते हैं, लेकिन इसके लिए हमें अपने अहंकार को त्यागना होगा और उन पर अटूट आस्था रखनी होगी। जैसा कि उन्होंने प्रसिद्ध दोहे में कहा है:
✍️ — मधु शर्मा

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