शरीर ही प्रथम माध्यम है वेदों और उपनिषदों का उद्घोष है: ' शरीरं आद्यं खलु धर्मसाधनम्' (अर्थात्: सभी धर्मों, कर्तव्यों और साधनाओं को पूरा करने का सबसे पहला माध्यम यह शरीर ही है।) कल्पना कीजिए, यदि शरीर एक 'वाहन' है, तो हमारी 'प्राण ऊर्जा' उसकी चालक आत्मा है। जैसे हम अपने सबसे महंगे वाहन के रख-रखाव (Maintenance) में कोई कमी नहीं छोड़ते, ठीक वैसे ही इस देह रूपी रथ का ध्यान रखना हमारा प्राथमिक कर्तव्य है। गोपथ ब्राह्मण का अद्भुत काल-विज्ञान अथर्ववेद के गोपथ ब्राह्मण (1.5.5) में समय की इतनी सूक्ष्म गणना दी गई है कि आधुनिक परमाणु घड़ियाँ भी पीछे छूट जाएँ। वहां समय को केवल मिनटों में नहीं, बल्कि 'वर्षतोधारा' (332 पिकोसेकंड) तक मापा गया है। ऋषि समझाते हैं कि हमारी आयु वर्षों में नहीं, बल्कि 'श्वासों की संख्या' में तय है। जो जितनी उथली और तेज श्वास लेता है, वह अपनी जीवन-पूंजी उतनी ही जल्दी खर्च कर देता है। इसके विपरीत, श्वास को सूक्ष्म करना ही 'शतायु' (100 वर्ष जीने) का वैज्ञानिक आधार है। श्वास: एक अनवरत यज्ञ गोपथ ब्राह्मण में श्वास प्रक्रिया को एक ...
वेदऋचा: जहाँ साहित्य की ओज, संवेदना की गहराई और कृष्ण भक्ति का संगम होता है। मधु की डायरी के कुछ अनछुए पन्ने।