भूमिका: सोशल मीडिया का कोलाहल और हमारा उत्तर
आजकल सोशल मीडिया के गलियारों में एक चर्चा अत्यंत प्रखर है—तमिलनाडु की राजनीति। मुद्दा यह है कि वहाँ के किसी भी बड़े राजनीतिक दल ने ब्राह्मण उम्मीदवार को चुनाव लड़ने हेतु टिकट नहीं दिया। इस समाचार ने पूरे देश के ब्राह्मण समाज को उद्वेलित और आहत कर दिया है। चारों ओर एक हताशा का वातावरण है; समाज का एक बड़ा वर्ग स्वयं को हतोत्साहित मान रहा है और ऐसा अनुभव कर रहा है मानो उसे मुख्यधारा से काटकर 'हाशिए' पर धकेला जा रहा है।
किंतु, क्या एक 'टिकट' हमारा अस्तित्व तय करेगा? कदापि नहीं! ब्राह्मणों को इस समय अपने उस विराट इतिहास को स्मरण करने की आवश्यकता है, जो संकटों में ही निखरकर सामने आया है।
याद रखिये, जब सरस्वती नदी सूखी थी... तब हमारे पूर्वजों ने विलाप नहीं किया था। जल ही जीवन था, और वही स्रोत लुप्त हो गया था, किंतु उस समय उन्होंने 'नूतन विकल्प' चुने। वे गंगा के उर्वर मैदानों की ओर बढ़े, उन्होंने नए भूगोल रचे और अपनी मेधा से एक ऐसी नई सभ्यता खड़ी कर दी जिसने विश्व का मार्गदर्शन किया। आज राजनीति की धाराएँ भले ही सूखती दिख रही हों, लेकिन यह अंत नहीं, बल्कि एक नए 'महाप्रयाण' का संकेत है।
मेघा का समृद्ध इतिहास: जब स्मृति ही पुस्तकालय बनी
जब आक्रांताओं की लपटों ने नालंदा और तक्षशिला के ग्रंथों को भस्म किया, तब ब्राह्मणों ने एक अभूतपूर्व निर्णय लिया। उन्होंने कागजों के बजाय 'कंठ' को अपना पुस्तकालय बनाया।
जीभ कटवा ली, पर ज्ञान नहीं छोड़ा:
तलवारों के साये में भी ऋचाओं का पाठ नहीं रुका। इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जहाँ ब्राह्मणों ने अपनी जिह्वा कटवा लेना स्वीकार किया, पर वेदों के एक भी स्वर को अशुद्ध नहीं होने दिया।
विग्रहों सहित जल समाधि: त्याग की पराकाष्ठा
जब मंदिरों पर संकट आया, तब पुजारियों ने अपनी जान की परवाह किए बिना देव-विग्रहों को अपनी गोद में लेकर गहरे कुओं में छलांग लगा दी। वे स्वयं जल समाधि में लीन हो गए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने आराध्य के दर्शन कर सकें। यह 'त्याग' ही हमारी नींव है।
वर्तमान की विडंबना: कुंठा का अंधकार
आज की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जो ब्राह्मण 'अपरिग्रह' और 'त्याग' का प्रतीक था, उसकी नई पीढ़ी—हमारे ब्राह्मण कुमार और कुमारियां—आज कुंठा की शिकार हैं। संगति के प्रभाव और गौरवशाली इतिहास से अनभिज्ञता के कारण वे स्वयं को जाति-व्यवस्था के कठघरे में खड़ा पा रहे हैं।
"जो समाज अपनी जड़ों को शोषक मानकर काटने लगे, वह कभी वटवृक्ष नहीं बन सकता।"
प्रिय युवा साथियों, उठो! अपनी मेधा को 'अपराधबोध' (Guilt) के पिंजरे से आजाद करो। तुम उस परंपरा के वाहक हो जिसने शून्य से लेकर अनंत तक का मार्ग प्रशस्त किया है।
मेधा का आधुनिक वर्चस्व: जहाँ राजनीति बौनी है
राजनीति तुम्हें टिकट से वंचित कर सकती है, लेकिन राष्ट्र को तुम्हारी मेधा से वंचित नहीं कर सकती। आज के भारत की शक्ति का केंद्र (Power Center) देखो, और पहचानो कि असली 'शासन' कहाँ है:
अजीत डोभाल (NSA): जिनकी बुद्धिमानी भारत की सीमाओं का सुरक्षा कवच है।
पी. के. मिश्रा (PM के प्रधान सचिव): जो राष्ट्र की नीतियों के शिल्पकार हैं।
टी. वी. सोमनाथन (कैबिनेट सचिव): जिनके हस्ताक्षर से भारत का प्रशासन चलता है।
आर. वेंकटरमणी (अटॉर्नी जनरल): जो संविधान की जटिलताओं के सर्वोच्च व्याख्याता हैं।
ये नाम सिद्ध करते हैं कि 'ब्रेन' (Intellect) हमेशा 'बैलट' (Votes) से ऊपर रहता है। मेधा के इन शिखरों पर बैठे व्यक्ति इस बात का प्रमाण हैं कि जब-जब योग्यता की कसौटी होगी, ब्राह्मण अपनी मेधा के दम पर सर्वोपरि रहेगा।
आह्वान
निष्कर्ष: प्रोएक्टिव अप्रोच—नया विकल्प
हमें नकारात्मकता त्यागकर 'सकारात्मकता' की ओर बढ़ना होगा। यदि राजनीति के द्वार बंद हैं, तो तकनीक, विज्ञान, कला और अध्यात्म के द्वार खुले हैं। ब्राह्मण होने का अर्थ 'विशेषाधिकार' मांगना नहीं, बल्कि 'स्वयं को योग्य बनाना' है।
अपनी जड़ों की ओर लौटें, शास्त्रों का अध्ययन करें और आधुनिक कौशल (Skill) में पारंगत हों। जब आप श्रेष्ठ होंगे, तो समाज स्वयं आपके चरणों में स्थान मांगेगा। याद रखिये, चाणक्य को किसी राजा ने टिकट नहीं दिया था, उन्होंने स्वयं सम्राटों का निर्माण किया था।
✍️ — मधु शर्मा (वेदऋचा)

कुंठा त्याग कर स्वधर्म, वेद अध्ययन, और अपनी जड़ों की और लौटना ही समाधान है। ब्राह्मण का अर्थ ही मेघा है। अपनी शक्ति पहचाननी होगी और फिर से ज्ञान का दीपक जलाना पड़ेगा।
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