ब्राह्मण फ़ाइल्स अंक १९: जब ज्ञान की पीठ धू-धू कर जली — नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला के पुस्तकालयों का दहन।
प्रज्वलितो ज्ञानमयः प्रदीपः। ( महाभारत — ज्ञान का यह दिव्य दीपक सदा जलता रहे; परंतु जब बर्बरता ने इस दीप को बुझाने का कुत्सित प्रयास किया, तब संस्कृति पर अस्तित्व का सबसे बड़ा संकट आन पड़ा।) ११९३ ईस्वी में जब बख्तियार खिलजी की बर्बर सेना ने नालंदा महाविहार में आग लगाई, तो कोई सैन्य छावनी नहीं जली थी, बल्कि सहस्राब्दियों का संचित मानव-ज्ञान भस्म हुआ था। नालंदा का विशाल ग्रंथालय 'धर्मगंज' (रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक) तीन महीने तक निरंतर धू-धू कर जलता रहा। ९० लाख से अधिक अमूल्य पांडुलिपियाँ राख के ढेर में बदल गईं। तक्षशिला, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे ज्ञान-तीर्थों को खंडहर बना दिया गया और निहत्थे विद्वानों व आचार्यों का कत्लेआम किया गया। जानिए आक्रांताओं द्वारा भारत की बौद्धिक मेधा के संहार और उस महासंकट का प्रामाणिक इतिहास। १. ज्ञान के वैश्विक केंद्रों पर बर्बर आघात प्राचीन भारत के विश्वविद्यालय केवल शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के बौद्धिक मस्तक थे: नालंदा का धर्मगंज: तीन बहुमंजिला विशाल भवनों (रत्नोदधि, रत्नसागर, रत्नरंजक) में खगोल, गणित, आयुर्वेद, व्याकरण, धातु-व...