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ब्राह्मण फ़ाइल्स अंक 7 : वैदिक ऋषिकाएँ व विदुषी परंपरा — गार्गी, मैत्रेयी से उभय भारती तक

 यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्कथं तेनामृता स्यामिति?

(बृहदारण्यक उपनिषद — जिससे मुझे अमृतत्व न मिले, उस धन-संपदा का मैं क्या करूँ?)

औपनिवेशिक और वामपंथी इतिहासकारों ने यह भ्रामक विमर्श गढ़ा कि प्राचीन भारत में स्त्रियों को ज्ञान, वेदाध्ययन और निर्णय लेने के अधिकारों से वंचित रखा गया था। परंतु सनातन इतिहास साक्षी है कि जब आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के मध्य सदी का सबसे बड़ा दार्शनिक शास्त्रार्थ हुआ, तो उसकी मुख्य निर्णायक (Judge) एक विदुषी स्त्री—उभय भारती थीं। गार्गी के अकाट्य तर्कों से लेकर, मैत्रेयी द्वारा समस्त पृथ्वी के वैभव को ठुकराने और गुरुकुलों में विद्यार्थियों को गढ़ने वाली त्यागी गुरुमाताओं तक—जानिए सनातन में स्त्री-मेधा और निःस्वार्थ ज्ञान-साधना का सत्य।


१. विदुषी उभय भारती: दर्शन के महासंग्राम की निष्पक्ष निर्णायक

८वीं शताब्दी में जब जगद्गुरु आदि शंकराचार्य और मीमांसा के प्रकांड विद्वान आचार्य मंडन मिश्र के बीच अद्वैत और द्वैत पर ऐतिहासिक शास्त्रार्थ हुआ, तब दोनों आचार्यों ने सर्वसम्मति से मंडन मिश्र की विदुषी पत्नी उभय भारती को शास्त्रार्थ का मुख्य निर्णायक (Judge) नियुक्त किया।

उन्होंने बिना किसी पक्षपात के अपने पति की पराजय स्वीकार करते हुए शंकराचार्य जी के पक्ष में सत्य का निर्णय दिया।

इसके उपरांत उन्होंने स्वयं शंकराचार्य जी को शास्त्रार्थ की चुनौती दी। यह ऐतिहासिक घटना सिद्ध करती है कि सनातन में स्त्री केवल विदुषी ही नहीं, बल्कि ज्ञान और न्याय की सर्वोच्च प्रामाणिक सत्ता मानी जाती थी।


२. धन के प्रति अनासक्ति: महर्षि भृगु से विदुषी मैत्रेयी तक

सनातनी ब्राह्मण परंपरा में धन और भौतिक वैभव को कभी साध्य नहीं माना गया। जिस प्रकार महर्षि भृगु ने सांसारिक वैभव और लक्ष्मी के मोह से परे रहकर सत्य की परीक्षा ली, उसी प्रकार विदुषी मैत्रेयी ने भी समस्त पृथ्वी के ऐश्वर्य को क्षणभंगुर मानकर ठुकरा दिया। जब महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन्हें सांसारिक संपत्ति देनी चाही, तो उन्होंने स्पष्ट कहा:

"यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्कथं तेनामृता स्यामिति?"

अर्थात् यदि धन-वैभव से भरी यह संपूर्ण पृथ्वी भी मुझे मिल जाए, तो क्या मुझे अमृतत्व मिल जाएगा? जब उत्तर 'नहीं' मिला, तो उन्होंने समस्त भौतिक संपदा को त्यागकर केवल 'आत्म-ज्ञान' का मार्ग चुना। ब्राह्मण कुल में पुरुष हों या स्त्रियाँ, सदा ज्ञान ही सर्वोच्च रहा।


३. विदुषी गार्गी वाचक्नवी: राजसभा में ऐतिहासिक शास्त्रार्थ

बृहदारण्यक उपनिषद (तृतीय अध्याय) में राजा जनक की राजसभा का वर्णन है, जहाँ भारतवर्ष के प्रकांड विद्वानों के मध्य विदुषी गार्गी (ऋषि वचक्नु की विदुषी पुत्री) ने महर्षि याज्ञवल्क्य से ब्रह्मांड की उत्पत्ति और 'अक्षर ब्रह्म' पर निर्भीक और गूढ़ दार्शनिक प्रश्न पूछे। यह शास्त्रार्थ प्रमाणित करता है कि भारत में स्त्री दर्शन के सर्वोच्च शिखर पर पुरुषों को चुनौती देने वाली बौद्धिक शक्ति थी।


४. गुरुकुल परंपरा में गुरुमाताओं का योगदान

गुरुकुलों में ऋषियों के साथ उनकी विदुषी पत्नियों (गुरुमाताओं) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। जहाँ ऋषि वेदों और शस्त्रों की शिक्षा देते थे, वहीं गुरुमाताएँ विद्यार्थियों को:


  • गृह-कार्यों और व्यावहारिक जीवन में निपुणता,
  • जीवन की कठिन परिस्थितियों के लिए सहनशीलता, अनुशासन और सेवाभाव,
  • तथा उच्च संस्कारों और मानवीय संवेदनाओं से सिंचित करती थीं।


५. जनकल्याण हेतु शास्त्रार्थ — कोई स्वार्थ नहीं

प्राचीन काल में शास्त्रार्थ कभी अहंकार प्रदर्शन या व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज के कल्याण, सत्य की खोज और दिशा-निर्देशन के लिए किए जाते थे। विदुषी गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा और उभय भारती ने सिद्ध किया कि ब्राह्मण परंपरा में स्त्रियाँ ज्ञान की सह-यात्री और समाज की मार्गदर्शक थीं।


💡 निष्कर्ष

गार्गी का तर्क, मैत्रेयी का त्याग और उभय भारती की निर्णायक मेधा यह सिद्ध करती है कि सनातन में ज्ञान लिंग-भेद से परे था और विदुषी स्त्रियाँ संस्कृति की सर्वोच्च संरक्षिका थीं।


अगले अंक में पढ़िए —


अंक ८: महर्षि अगस्त्य और लोपामुद्रा — दक्षिण भारत में वैदिक संस्कृति का विस्तार, जल-प्रबंधन और विज्ञान-दृष्टि!


✍️ - मधु शर्मा


#BrahminFiles #VedaRicha #ब्राह्मण_फाइल्स



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