ब्राह्मण फ़ाइल्स अंक १६: सनातन स्त्री शिक्षा व विदुषी परंपरा — मनुस्मृति के नाम पर दुष्प्रचार और सर्व-समावेशी ज्ञान का सच
ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्।
(अथर्ववेद ११/५/१८ — कन्या ब्रह्मचर्य व्रत (गुरुकुल शिक्षा व विद्याध्ययन) पूर्ण करके ही सुयोग्य वर का वरण करती है।)
औपनिवेशिक मैकालेवादी व्यवस्था और आधुनिक विभाजनकारी विमर्शों ने मनुस्मृति के भ्रामक संदर्भों को हथियार बनाकर यह सफेद झूठ फैलाया कि सनातन धर्म में केवल एक वर्ग की स्त्री को शिक्षा व उपनयन (यज्ञोपवीत) का अधिकार था और बाकी को वंचित रखा गया। परंतु वैदिक संहिताएं, धर्मसूत्र और भारत का भक्ति-इतिहास गवाह है कि ब्राह्मण परंपरा ने विद्यादान में कभी कुल या लिंग का भेद नहीं किया। वैदिक काल की गार्गी-मैत्रेयी से लेकर तथाकथित वंचित वर्गों से आने वाली संत जनाबाई, सोयराबाई, सहजोबाई और दयाबाई तक—सनातन संस्कृति ने समाज के प्रत्येक वर्ग की नारी मेधा को पूजा और उन्हें तत्वज्ञान की सर्वोच्च पीठ पर बिठाया। जानिए सर्व-समावेशी स्त्री शिक्षा का प्रामाणिक सच।
१. मनुस्मृति के नाम पर दुष्प्रचार का खंडन
आधुनिक आलोचक औपनिवेशिक अनुवादों का सहारा लेकर आरोप लगाते हैं कि मनुस्मृति ने स्त्रियों को शिक्षा और स्वावलंबन से वंचित किया। जबकि मूल तथ्य इसके सर्वथा विपरीत हैं:
- मनुस्मृति (२/१४५): "उपाध्यायान् दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता। सहस्रं तु पितॄन् माता गौरवेणातिरिच्यते॥" (दस उपाध्यायों से बड़ा एक आचार्य होता है, सौ आचार्यों से बड़ा पिता होता है, परंतु सहस्र पिताओं से भी अधिक गौरवमयी माँ होती है।)
- मनुस्मृति (३/५६): "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।" (जहाँ नारियों का सत्कार होता है, वहाँ देवता वास करते हैं।)
- कन्याओं का यज्ञोपवीत: हारीत धर्मसूत्र (२१/२३) स्पष्ट करता है कि समाज की कन्याओं का विधिवत उपनयन संस्कार होता था। जो आजीवन वेदाध्ययन करती थीं, उन्हें 'ब्रह्मवादिनी' और जो विवाह पूर्व तक अध्ययन करती थीं, उन्हें 'सद्योवधू' कहा जाता था।
२. वैदिक काल: २७ से अधिक महिला ऋषिकाओं का अमर योगदान
ऋग्वेद में २७ से अधिक विदुषी ऋषिकाओं के सूक्त दर्ज हैं, जिन्होंने वेदों के मंत्रों का साक्षात्कार किया:
- गार्गी वाचक्नवी: वृहदारण्यक उपनिषद में सम्राट जनक की विद्वत-सभा में महर्षि याज्ञवल्क्य से ब्रह्मज्ञान पर शास्त्रार्थ करने वाली प्रखर विदुषी।
- मैत्रेयी: जिन्होंने भौतिक संपदा को तुच्छ मानकर अमरता का आत्मज्ञान चुना।
- घोषा, अपाला, विश्ववारा, लोपामुद्रा और सिकता: इन ऋषिकाओं ने यज्ञों का संचालन किया और संपूर्ण समाज का मार्गदर्शन किया।
३. सर्व-समावेशी ज्ञान परंपरा: समाज के सभी वर्गों की विदुषियाँ
सनातन ज्ञान केवल किसी एक वर्ग की स्त्रियों तक सीमित नहीं था। समय-समय पर समाज के हर वर्ग की विदुषियों ने तत्वज्ञान और साहित्य की रचना की:
- संत जनाबाई (दलित/शूद्र कुल): महाराष्ट्र की महान विदुषी और कवयित्री, जिनके अभंगों में अद्वैत वेदांत और उच्च कोटि के तत्वज्ञान की व्याख्या मिलती है।
- संत सोयराबाई व निर्मलाबाई (महार कुल): इन्होंने देह-जाति के पाखंड को तोड़कर वेदानुकूल आत्म-ज्ञान का उपदेश दिया।
- संत सहजोबाई व दयाबाई (वैश्य/धूसर कुल): १८वीं सदी में 'सहज प्रकाश' और 'दयाबोध' जैसे गूढ़ दार्शनिक ग्रंथों की रचना कर बड़े-बड़े विद्वानों को चकित किया।
- आंडाल (गोदा देवी): दक्षिण भारत की विदुषी, जिनके 'तिरुप्पावै' को वेदों के समतुल्य माना गया।
४. आक्रांताओं के काल में सुरक्षा और ब्रिटिश षड्यंत्र
मध्यकाल में जब विदेशी आक्रांताओं ने भारत की कन्याओं और गुरुकुलों पर बर्बर प्रहार किए, तब सुरक्षा कारणों से बालिकाओं को घर पर ही शिक्षा देने की व्यवस्था बनी। अंग्रेजों ने इस रक्षात्मक परिस्थिति को 'धार्मिक भेदभाव' का नाम देकर प्रचारित किया ताकि हिंदू समाज को विभाजित किया जा सके।
💡 निष्कर्ष
सनातन भारत में नारी सदा ज्ञान, स्वाभिमान और साधना की प्रतीक रही। ब्राह्मण आचार्यों ने विद्यादान में कभी पात्रता के अतिरिक्त कोई भेद नहीं देखा। गार्गी से लेकर जनाबाई तक की अमर परंपरा इस सत्य की साक्षी है।
अगले अंक में पढ़िए —
अंक १७: ब्राह्मण समाज सुधारक संत व लोकभाषा — जब उपनिषदों का गूढ़ ज्ञान भक्तिरस बनकर हर वर्ग तक पहुँचा।
✍️-मधु शर्मा
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