ब्राह्मण फ़ाइल्स: अखंड भारत के निर्माता आचार्य चाणक्य — निसंग त्याग, लोभमुक्ति और कुटिया में गढ़ा साम्राज्य
चाणक्य नीति — विद्वत्ता और राजा की सत्ता की कभी तुलना नहीं हो सकती; राजा केवल अपने देश में सम्मान पाता है, जबकि ज्ञानी सर्वत्र पूजा जाता है।
जिस व्यक्ति के एक संकेत पर एशिया का सबसे विशाल साम्राज्य अपनी नीतियां तय करता था, जिसने सिकंदर के यूनानी आक्रमणकारियों को खदेड़कर और अन्यायी नंद वंश को जड़ से उखाड़कर प्रथम 'अखंड भारत' की स्थापना की, वह महामात्य स्वयं राजप्रासादों में नहीं, बल्कि नगर के बाहर एक घास-फूस की कच्ची कुटिया में रहता था। औपनिवेशिक व वामपंथी नैरेटिव्स ने जिस ब्राह्मण परंपरा को 'सत्ता-लोलुप' और 'स्वार्थी' कहकर लांछित किया, उस परंपरा के शिखर पुरुष आचार्य चाणक्य ने यह सिद्ध किया कि ब्राह्मण सत्ता का निर्माता हो सकता है, परंतु वह कभी सत्ता और संपत्ति का दास नहीं होता। जानिए आचार्य चाणक्य के निसंग त्याग, अलोभ और निष्काम राष्ट्र-धर्म का अमर ऐतिहासिक सच।
१. दो दीयों की ऐतिहासिक कथा: लोभमुक्ति और राजकोष की शुचिता
आचार्य चाणक्य के जीवन का सबसे प्रसिद्ध प्रसंग उनकी चारित्रिक पवित्रता और सार्वजनिक धन के प्रति संवेदनशीलता का अद्वितीय प्रमाण है:
- जब एक विदेशी राजदूत (मेगस्थनीज / अन्य दूत) रात्रि के समय आचार्य चाणक्य से मिलने उनकी कुटिया में पहुँचा, तो चाणक्य ने राजकीय कार्यों से जुड़ा दीया बुझाकर दूसरा दीया प्रज्वलित किया।
- विस्मित राजदूत ने जब इसका कारण पूछा, तो चाणक्य ने सहजता से उत्तर दिया: "पहला दीया राजकोष के धन के तेल से जल रहा था क्योंकि मैं राज्य का कार्य कर रहा था। अब मैं आपसे व्यक्तिगत बातचीत कर रहा हूँ, इसलिए मैंने अपने निजी उपार्जन से खरीदा हुआ दीया जलाया है।"
- जिस महामात्य के मन में राज्य के एक बूंद तेल के प्रति भी ऐसा अपरिग्रह और उत्तरदायित्व हो, उस पर धन-लोलुपता का आरोप लगाना केवल वैचारिक दिवालियापन है।
- पाटलिपुत्र के प्रधानमंत्री का आवास राजमहल के भीतर नहीं, बल्कि नगर सीमा पर एक साधारण पर्णकुटी थी।
- कुटिया में उपले सुखाए जा रहे थे, दीवारों पर केवल शास्त्र और पांडुलिपियाँ लटकी थीं और शयन के लिए केवल सूखी घास व कुशा का आसन था।
- चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को सम्राट बनाया, परंतु स्वयं कभी कोई पद, जागीर या उपाधि अपने या अपने परिवार के लिए स्वीकार नहीं की।
- "प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।" प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है और प्रजा के हित में ही उसका हित है।
- चाणक्य का संपूर्ण जीवन यह संदेश देता है कि ब्राह्मण सत्ता का मार्गदर्शक और संरक्षक हो सकता है, लेकिन उसका वास्तविक बल उसके त्याग, तप और निष्पक्ष निर्णय-क्षमता में निहित है।

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