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प्रकृति का क्रंदन और आधुनिकता का भ्रम

आज का समाज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ 'प्रगति' की परिभाषा ही बदल गई है। युवतियों का विवाह और परिवार से दूरी बनाकर केवल कैरियर पर ध्यान केंद्रित करना, पहली नज़र में 'सशक्तिकरण' लग सकता है, लेकिन गहराई से देखने पर यह प्राकृतिक संतुलन के साथ एक भयानक खिलवाड़ है।



1. स्त्री: जगत की 'सृजन शक्ति'

अध्यात्म और विज्ञान, दोनों इस बात को स्वीकार करते हैं कि स्त्री 'शक्ति' का वो स्वरूप है—जो सृजन करती है, और जीवन को विस्तार देती है।  

  • भटकाव: आज की युवती विवाह को 'झंझट' और परिवार को 'बोझ' समझने लगी है। वह पुरुष के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की चाह में अपनी उस विशिष्ट गरिमा को खो रही है, जो केवल उसके पास ही है। 
  • असंतुलन: जब सृजन का स्रोत ही सूखने लगेगा या वह अपनी दिशा बदल लेगा, तो आने वाली पीढ़ियां संस्कारविहीन और भावनात्मक रूप से रिक्त होंगी। पुरुष की भूमिका संघर्ष और सुरक्षा की है, लेकिन स्त्री की भूमिका 'आधार' और 'सृजन' की है। यदि आधार ही खिसक गया, तो समाज की इमारत ढह जाएगी।

2. डरावने आंकड़े और वर्तमान स्थिति

अंतरराष्ट्रीय सर्वे बताते हैं कि विकसित और विकासशील देशों में 45% तक युवतियां अकेले रहना पसंद कर रही हैं। 

  • अकेलापन उद्योग का विस्तार: डिप्रेशन, एंग्जायटी और हार्मोनल बीमारियों का बढ़ता ग्राफ यह सिद्ध करता है कि हम प्रकृति के नियमों के विरुद्ध जा रहे हैं। 
  • जनसांख्यिकीय संकट: कई देश आज 'बूढ़े' हो रहे हैं क्योंकि वहां जन्म दर गिर गई है। युवा शक्ति के अभाव में राष्ट्र की आत्मा क्षीण हो जाती है।

3. 'अभी नहीं' की ज़िद और 'कभी नहीं' का पछतावा

कैरियर के लिए 21 से 28 वर्ष की उस स्वर्णिम आयु को गंवा देना, जो परिवार बसाने और मातृत्व के लिए सर्वोत्तम है, एक आत्मघाती कदम है। 

  • सच्चाई: ऑफिस की फाइलें और पदोन्नति की सीढ़ियां वृद्धावस्था में आपको वह सुरक्षा और ममता नहीं दे सकतीं, जो एक भरा-पूरा परिवार देता है।
  • समाज को संदेश: स्त्री को पुरुष बनने की आवश्यकता नहीं है, उसे 'स्त्री' बने रहकर ही सृष्टि को बचाना होगा। अपनी मूल प्रवृत्ति (सृजन) को छोड़कर पुरुष के कार्यों की नकल करना प्रगति नहीं, बल्कि स्वयं के अस्तित्व का ह्रास है।

 निष्कर्ष: 

"पुरुष यदि पौरुष का प्रतीक है, तो स्त्री करुणा और सृजन की गंगा है। यदि गंगा अपना मार्ग बदलकर मरुस्थल की ओर मुड़ जाए, तो सभ्यता की प्यास कभी नहीं बुझ पाएगी। जागिए! क्योंकि यह केवल एक युवती का फैसला नहीं, पूरे भविष्य का विनाश है।"


✍️ — मधु शर्मा (VedaRicha)

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टिप्पणियाँ

  1. बहुत अच्छा लेख। माता पिता का दायित्व भी बनता है। समाज को इस पर गहन विचार करना होगा अन्यथा सृष्टि का संतुलन निश्चित तौर से बिगड़ने की प्रबल संभावना है।

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