सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कर्म की निष्ठा और नियति का न्याय: गबरू किसान की एक व्यथा


                            "फसल गिरी है, हौसला नहीं।"

जीवन के रंगमंच पर हम सभी अपने-अपने हिस्से का अभिनय करते हैं। गबरू किसान ने भी वही किया—पूरी निष्ठा, पसीने की बूंदों और शुद्ध ऑर्गेनिक खाद से उसने मिट्टी को सींचा। उसकी लहलहाती फसलें इस बात का प्रमाण थीं कि 'कर्म' कभी व्यर्थ नहीं जाता। लेकिन तभी प्रकृति का एक क्रूर प्रहार होता है, और पकी हुई सुनहरी फसल ओलावृष्टि की भेंट चढ़ जाती है।



यहाँ एक यक्ष प्रश्न खड़ा होता है: क्या कर्म ही सब कुछ है, या भाग्य का पलड़ा भारी है?

1. कर्म: जो हमारे हाथ में है

गबरू ने जुताई की, खाद डाली और देखभाल की। यह उसका अधिकार क्षेत्र था। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन—अर्थात हमारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं। गबरू का संतोष उसकी मेहनत में था, जो उसने पूरी ईमानदारी से निभाई। कर्म हमें पुरुषार्थ की शक्ति देता है और आत्म-सम्मान से भरता है।

2. भाग्य: जो हमारे नियंत्रण से बाहर है

बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि गबरू के नियंत्रण में नहीं थी। इसे हम 'नियति' या 'परिस्थिति' कह सकते हैं। कई बार हम बीज बोते हैं, लेकिन अंकुरण का समय और वातावरण हमारे वश में नहीं होता। क्या इसका अर्थ यह है कि भाग्य कर्म से बड़ा है?

3. समन्वय ही जीवन का सत्य है

गबरू की गिरी हुई फसल को देखकर मन उदास होना स्वाभाविक है, लेकिन यही वह मोड़ है जहाँ कर्म और भाग्य का असली मेल होता है।

भाग्य आपको नीचे गिरा सकता है, लेकिन कर्म आपको फिर से उठकर खड़े होने का साहस देता है।

यदि गबरू ने मेहनत न की होती, तो उसे अफसोस होता कि उसने प्रयास ही नहीं किया। लेकिन आज उसका मस्तक ऊंचा है क्योंकि उसने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया।

निष्कर्ष

गबरू की कहानी हमें सिखाती है कि भाग्य भले ही फसल छीन ले जाए, लेकिन वह किसान के उस अनुभव और कौशल को नहीं छीन सकता जिससे वह अगली बार फिर से हरियाली लाएगा। कर्म वह बीज है जो आज नहीं तो कल, किसी न किसी रूप में फल अवश्य देता है।

"भाग्य केवल द्वार खोलता है, लेकिन उस द्वार के भीतर प्रवेश करने के लिए कर्म के पैरों की ही आवश्यकता होती है।"


✍️ — मधु शर्मा (VedaRicha)


#VedaRicha_
#कर्म_बनाम_भाग्य
#मिट्टीकीखुशबू
धैर्य_और_स्वीकार्यता

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

ऋण की वसूली या अंतिम विदाई? एक माँ की पुकार और संसार की नश्वरता

 संसार एक रंगमंच है, जहाँ हम सब अपनी भूमिका निभाने आते हैं। लेकिन कभी-कभी कुछ भूमिकाएँ इतनी कठिन होती हैं कि वे हमें जीवन के असली अर्थ और 'परम शक्ति' के अस्तित्व का साक्षात्कार करा देती हैं। हाल ही में गाजियाबाद के हरीश राणा का प्रसंग और उनकी माँ का वह विदाई वीडियो देखकर मन में एक गहरा वैराग्य उत्पन्न हुआ है।  विज्ञान की हार, प्रारब्ध की जीत   हम अहंकार में कहते हैं कि "मैं कर लूँगा", "मैं बचा लूँगा"। विज्ञान ने मशीनें बनाईं, कानून ने नियम बनाए, लेकिन 13 वर्षों तक कोमा (PVS) में पड़े उस युवक के प्राणों पर किसी का वश नहीं चला। जब विधाता की डोर खिंचती है, तो बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ और संचित धन-दौलत धरे के धरे रह जाते हैं। क्या यह विज्ञान की हार नहीं? क्या यह उस ईश्वर की इच्छा का प्रमाण नहीं कि साँसें देना और लेना केवल उसी के हाथ में है?   ऋण का लेन-देन:  एक मर्मस्पर्शी सत्य इस प्रसंग को देख ऐसा प्रतीत होता है मानो यह पिछले जन्म का कोई गहरा 'लेन-देन' था। माता-पिता ने अपनी पूरी कमाई, अपनी रातों की नींद और अपने जीवन के 13 बहुमूल्य वर्ष उस बच्चे पर न्योछावर ...

श्रेष्ठता का अहंकार: धर्म या विनाश का मार्ग?

"सिर्फ मेरा रास्ता ही खुदा का रास्ता है और बाकी सब वध के योग्य हैं" — क्या यह विचार किसी ईश्वरीय सत्ता का हो सकता है? या यह मनुष्य के अपने अहंकार की उपज है? आज विश्व जिस अशांति और वैमनस्य की आग में जल रहा है, उसका मूल कारण किसी धर्म की शिक्षा नहीं, बल्कि यह 'डॉक्ट्रीन' (Doctrine) है कि "मैं श्रेष्ठ हूँ और सिर्फ मैं ही श्रेष्ठ रहूँ।" जब 'स्व' का सम्मान 'दूसरे' के तिरस्कार में बदल जाता है, तो वहीं से कट्टरता का जन्म होता है। कोरे कागज़ पर नफ़रत की इबारत एक बच्चा जब जन्म लेता है, तो वह एक कोरा कागज़ होता है। उसके पास न कोई संप्रदाय होता है, न कोई शत्रु। उसे समाज, माहौल और शिक्षा यह सिखाते हैं कि उसे किसे प्रेम करना है और किससे घृणा। यदि बचपन से ही यह बीज बोया जाए कि "हमारा मत ही एकमात्र सत्य है," तो वह बच्चा बड़ा होकर सत्य का खोजी नहीं, बल्कि एक कट्टर योद्धा बनता है। सहिष्णुता (Tolerance) पर्याप्त नहीं है अक्सर हम 'सहिष्णुता' की बात करते हैं। लेकिन सहिष्णुता का अर्थ है— "मैं तुम्हें बर्दाश्त कर रहा हूँ।" सच्चा धर्म सहिष्ण...

अहंकार की हार और आस्था की जीत – संत मलूक दास की कहानी

सिहांसन हिल उठे, पर न डिगी अटल वो टेक, भूख से बेहाल, पर न झुका वो भाल एक। अनहद नाद गूँजा, जब मौन ने ली अँगड़ाई, तब 'अजगर' सी हठ देख, विधाता ने राह बनाई॥ महात्मा मलूक दास जी के मन में एक बार एक 'हठ' पैदा हुई। उन्होंने सोचा, "क्या ईश्वर वास्तव में कण-कण में व्याप्त है? क्या वह हर परिस्थिति में अपने भक्त को ढूंढ सकता है?" उन्होंने भगवान की इस सर्वव्यापकता और पालनहार शक्ति को परखने का निर्णय लिया। वे एक वीरान जंगल में गए और एक ऊँचे बरगद के पेड़ पर जाकर छिप गए। शर्त ये थी, " न मैं हाथ हिलाऊंगा, न मुँह खोलूंगा। देखूं तू खिलाता कैसे है!" शाम हुई... भूख से शरीर टूटने लगा, पर मलूक दास जी अडिग थे। तभी अचानक, परिस्थितियों ने एक नया मोड़ लिया। राजा का काफिला आया, छप्पन भोग सजे, पर नियति देखिए... डाकुओं के डर से वे सब खाना छोड़कर भाग निकले। अब नीचे भगवान का प्रसाद सजा था, पर मलूक दास जी की जिद अब भी बरकरार थी। तभी वहां 'मौत' का दूसरा नाम यानी खूंखार डाकू आ धमके। मलूक दास जी बरगद की ऊँची डाल पर दुबके बैठे थे, और नीचे छप्पन भोग की महक हवाओं में तैर रही थी। ...