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भिक्षा: पुण्य या पुरुषार्थ का गला घोंटने वाला अभिशाप?

एक कर्मयोगी की टूटी आस

शहर की गलियों में एक मोटरसाइकिल पर गैस चूल्हे और कुकर ठीक करने वाला व्यक्ति जब सुबह निकलता था, तो उसके माथे पर पसीने की बूंदें उसके 'स्वाभिमान' की चमक होती थीं। दिन भर की भागदौड़, काले होते हाथ और ₹5-₹10 के लिए ग्राहकों से होती बहस के बाद वह शाम को ₹300 लेकर घर लौटता था।

लेकिन, एक दिन शहर की एक 'लाल बत्ती' ने उसका जीवन दर्शन हिला दिया। उसने देखा कि उसी सड़क पर खड़ा एक भिखारी, बिना किसी हुनर, बिना किसी औजार और बिना किसी पसीने के, केवल हाथ फैलाकर दिन भर में ₹1000 से ₹1200 बटोर रहा है।

चिंतन का प्रश्न: क्या परिश्रम से भीख माँगना श्रेष्ठ है?

यहीं से एक विचलित करने वाला प्रश्न जन्म लेता है। समाज की विडंबना देखिए—हम उस श्रमिक से कुकर ठीक कराने पर ₹10 कम कराने के लिए सौदेबाजी करते हैं, लेकिन उसी सिग्नल पर किसी याचक को ₹10 का सिक्का 'पुण्य' समझकर थमा देते हैं। क्या हमारा समाज केवल लाचारी को पहचानता है, पुरुषार्थ को नहीं?


विद्रूपता: जहाँ 'श्वानों' का मूल्य मनुष्य से अधिक है।

आज के भौतिकवादी युग में संसाधनों से सम्मान तय होता है। धनाढ्य परिवारों के पालतू कुत्तों के लिए मखमली बिस्तर और वातानुकूलित कमरे उपलब्ध हैं, लेकिन उसी समाज में एक मेहनतकश मजदूर के लिए अस्पताल की ठंडी जमीन भी नसीब नहीं। यह विरोधाभास तब और चुभता है जब हम जानवरों के भोग पर हजारों खर्च करते हैं, पर एक गरीब की मेहनत का उचित मूल्य देने में 'अर्थशास्त्र' समझाने लगते हैं।

श्वानों को मिलता दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं,
माँ की हड्डी से चिपक ठिठुर, जाड़े की रात बिताते हैं।"

भिक्षा: एक सामाजिक अभिशाप

मेरा विनम्रता पूर्वक यह संदेश समाज के लिए एक चेतावनी है, "भिक्षा देना पुण्य नहीं, एक अभिशाप है।" जब हम किसी सक्षम व्यक्ति को सड़क पर भीख देते हैं, तो हम उसे निठल्ला (Idle) बनाते हैं। हम उसके भीतर की उस शक्ति को मार देते हैं जो उसे स्वावलंबी बना सकती थी।

लाल बत्ती पर हाथ फैलाए व्यक्ति को सिक्का देकर आप अपनी आत्मा को तो संतुष्ट कर सकते हैं, पर आप उस व्यक्ति का भविष्य अंधकारमय कर रहे हैं। उसे काम के लिए प्रेरित करना, उसे श्रम का महत्व समझाना ही वास्तविक मानवता है। सिक्का देना आसान है, पर उसे राह दिखाना कठिन; और समाज अक्सर आसान रास्ता ही चुनता है।

दिनकर जी के ओजस्वी शब्दों में:

"शांति नहीं तब तक जब तक, सुख-भाग न नर का सम हो,
नहीं किसी को बहुत अधिक हो, नहीं किसी को कम हो।"

निष्कर्ष: स्वाभिमान की रक्षा करें।

यदि एक हुनरमंद कारीगर को लगने लगे कि मेहनत से बेहतर भीख माँगना है, तो यह उस व्यक्ति की हार नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक व्यवस्था की नैतिक मृत्यु है। हम 'पुरुषार्थ' को हतोत्साहित कर रहे हैं।

आइए संकल्प लें:

भिक्षा न दें: किसी को मुफ्त का धन देकर उसे समाज पर बोझ न बनाएं।

श्रम का सम्मान करें: जो पसीना बहा रहा है, उसकी मजदूरी में कटौती न करें।

प्रेरित करें: यदि कोई सक्षम होकर भी हाथ फैला रहा है, तो उसे श्रम की गरिमा समझाएं।

याद रखें, स्वाभिमान से कमाया गया ₹1, भीख में मिले ₹1000 से कहीं अधिक मूल्यवान है।

✍️ — मधु शर्मा (VedaRicha)


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