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नव-संवत्सर २०८३: चैत्र नवरात्रि पर्व

उठो धरा के वीर सुतों, देखो नव वर्ष आया है,
तरु-पल्लव ने केसरिया बाना, अंग-अंग सजाया है।

नई कोपलों की लाली में, छिपी सूर्य की ऊष्मा है,
फलों-फूलों के वैभव में, धरती बनी सगुप्मा है!

खेतों में जो लहरातीं फसलें, वह स्वर्णमयी श्रृंगार हैं,
झूम रही प्रकृति पाकर, ऋतुराज का अलंकार है।

नन्हे खग का कलरव देखो, जैसे बजती भेरी हो,
नवल वर्ष की बेला में, अब तनिक न कोई देरी हो!

चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा, गुरुवार का वह स्वर्ण-क्षण,
उन्नीस मार्च की भोर में सजा, नवल वर्ष का अभिनंदन।

रौद्र नाम संवत्सर का, तेरह मासों की माया है,
पुरुषोत्तम का अधिक मास, इस वर्ष धरा पर आया है!



और देखो, नभ से उतरी, जगदम्बा की सत्ता है,
नारी-शक्ति के चरणों में, झुकता हर इक पत्ता है।

भक्ति और शक्ति का यह, पावन मेल निराला है,
नवरात्रि के दीपों ने, मन का तिमिर निकाला है!

विक्रम संवत की विजय-ध्वजा, अंबर तक फहराने दो,
हिन्दू नव-उत्कर्ष का पावन, शंखनाद हो  जाने दो।

नमन करो उस महाशक्ति को, जो सृष्टि का आधार है,
प्रसन्नता के इस उत्सव में, रचा-बसा संसार है!

मधु शर्मा की ओर से आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई। नव वर्ष मंगलमय हो।

✍️ — मधु शर्मा

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