आज का समाज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ प्रगति की चकाचौंध तो है, पर संस्कार का प्रकाश लुप्तप्राय है। विडंबना देखिए कि जिस युवा शक्ति के कंधों पर राष्ट्र के नवनिर्माण का भार था, वही आज 'स्वतंत्रता' के नाम पर परोसी जा रही 'मानसिक दासता' का शिकार हो चुकी है। समाज दिशाहीनता के उस भंवर में है, जहाँ कुरीतियों ने अपने अदृश्य पर बहुत गहरे जाल फैला दिए हैं।
१. कुरीतियों का सूक्ष्म प्रहार और विवेक का अंत
आज की कुरीतियां पुरानी रूढ़ियों जैसी नहीं हैं जो दूर से पहचानी जा सकें; ये आधुनिकता का चोला पहनकर आती हैं। सोशल मीडिया के 'ट्रेंड्स', 'लाइक' की भूख और वर्चुअल दुनिया की कृत्रिमता—ये दिखने में बहुत छोटी और निर्दोष लगती हैं, लेकिन इनका प्रभाव हमारे आज्ञाकारी युवाओं के मस्तिष्क पर इतना गहरा है कि उनका अपना मौलिक 'विवेक' मर चुका है। युवा अब वह नहीं सोचता जो सही है, वह वही करता है जो 'दिखाया' जा रहा है।
२. चरित्रहीनता और अमर्यादित आचरण का उत्सव
मर्यादा, जो कभी भारतीय संस्कृति का आभूषण थी, उसे आज 'पिछड़ापन' घोषित कर दिया गया है। बड़ों का अनादर, अभद्र भाषा का प्रयोग और उच्छृंखल व्यवहार को 'कॉन्फिडेंस' और 'एटीट्यूड' का नाम देकर महिमामंडित किया जा रहा है। जब शिक्षा केवल जीविकोपार्जन का साधन मात्र रह जाए और उसमें योग दर्शन जैसी चारित्रिक दृढ़ता का अभाव हो, तो युवा उसी शक्ति की तरह हो जाता है जिसके पास बल तो है, पर दिशा देने वाला संस्कार नहीं।
३. अश्लीलता की डोर: पतन का सुनियोजित मार्ग
सबसे भयावह स्थिति अश्लीलता की गिरफ्त है। मनोरंजन के नाम पर जो परोसा जा रहा है, उसने युवा मानस को वासना के उस गर्त में धकेल दिया है जहाँ से वापसी का मार्ग धुंधला है। यह अश्लीलता केवल नग्नता तक सीमित नहीं, बल्कि विचारों की वह गंदगी है जो संबंधों की पवित्रता और स्त्री-पुरुष के गरिमापूर्ण आचरण को नष्ट कर रही है। युवा इस अश्लीलता की डोर में इतना कस चुका है कि उसे अपनी इस 'कैद' से ही प्यार होने लगा है।
४. चकाचौंध का आकर्षण और नीतियों का षडयंत्र
आज का वातावरण केवल 'उपभोग' सिखाता है। बाज़ारवाद की नीतियां ऐसी बुनी गई हैं कि युवा को अपनी जड़ों से काटकर केवल बाहरी चमक-दमक का गुलाम बना दिया जाए। वह चमक जिसे वह 'सफलता' समझ रहा है, वास्तव में उसके पतन का मार्ग है। संस्कारहीनता का यह वायरस आज की दोषपूर्ण शिक्षा और दूषित परिवेश के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी फैल रहा है।
५. राष्ट्र पर दुष्प्रभाव: ढहती हुई नींव
युवा शक्ति का यह पतन केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आपदा है। जिस देश का युवा विवेकहीन, चरित्रहीन और अश्लीलता की डोर में जकड़ा हो, उस राष्ट्र की 'बौद्धिक संपदा' और 'सांस्कृतिक अस्मिता' धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। इसका सीधा परिणाम बढ़ते सामाजिक अपराधों, पारिवारिक विखंडन और राष्ट्रीय उत्पादकता में गिरावट के रूप में सामने आता है। जब राष्ट्र का 'यौवन' ही वासना के दलदल में धंसा हो, तो वह देश 'विश्वगुरु' बनने के बजाय केवल एक 'मानसिक गुलामों का बाज़ार' बनकर रह जाता है। यह दिशाहीनता हमारे देश को एक ऐसी वैचारिक दरिद्रता की ओर ले जा रही है, जिससे उबरने में कई सदियाँ लग सकती हैं।
६. शिक्षा: बिना आत्मा का शरीर
हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली केवल 'कौशल' सिखा रही है, 'चरित्र' नहीं। जहाँ योग दर्शन और व्यास भाष्य जैसे ग्रंथों की गहराई से जीवन जीना सिखाया जाना था, वहाँ आज केवल 'पैकेज' की दौड़ है। बिना मूल्यों की शिक्षा उस विशालकाय व्यक्ति की तरह है जिसके पास चलने की शक्ति तो है, पर दिशा देने वाला विवेक मर चुका है।
निष्कर्ष: समय की पुकार
✍️ — मधु शर्मा

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