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गिरी का काला नीर: एक नटनी का शाप अंक 6

लोक-संस्कृति में जीवित गाथा और रूठी गिरिजा

जब प्रकृति किसी छल से आहत होकर रूठ जाती है, तो बस्तियां तो पुनः बस सकती हैं, किंतु ईश्वरीय सान्निध्य लौटकर नहीं आता। जानिए कैसे माँ गिरिजा के विमुख होने से सूखता गया सिरमौरी ताल, और कैसे लोकगीतों की अमर धुन में आज भी सिसकते हैं वे अभिशप्त खंडहर!

प्रलय का भयानक तांडव जब थमा, तो गिरि-बाटा घाटी का भूगोल और भाग्य दोनों सदा के लिए बदल चुके थे। अधर्म की सत्ता जलमग्न हो चुकी थी, किंतु इस संहार के बाद भी एक परम रिक्तता उस भूमि पर पसर गई।

शास्त्र कहते हैं कि शक्ति जब संहार करती है, तो वह केवल दंड नहीं देती, बल्कि मर्यादाविहीन स्थान का त्याग भी कर देती है।

माँ पार्वती की पावन स्वरूपा 'गिरिगंगा' उस छल, विश्वासघात और निर्दोष के बहे रक्त से इस कदर रूष्ट हुईं कि उन्होंने अपनी चिरंतन धारा ही मोड़ ली। वे उस अभिशप्त तट से विमुख हो गईं। जिस पावन नीर के किनारे कभी नागर शैली के स्वर्णिम मंदिर आलोकित होते थे, जहाँ वेद-मंत्र और शंखनाद गूंजते थे, उस तट पर माँ गिरिजा कभी पुनः लौटकर नहीं आईं।

पीछे छूट गया केवल एक विशाल, शांत और मटमैला दलदल—जिसे आने वाले कालखंड ने 'सिरमौरी ताल' कहा।

शताब्दियां बीतीं। समय का चक्र अपनी गति से घूमता रहा। मानव स्वभाव का नियम है कि वह राख के ढेरों पर भी जीवन की नई कोंपलें उगा लेता है। धीरे-धीरे नए लोग आए, उन्होंने उस वीराने के इर्द-गिर्द अपने नए आशियाने बना लिए, खेतों में हल चले और नई बस्तियां बस गईं। राजवंश भी बदला—सिरमौर की गद्दी पर नाहन और राजबन से नए यदुवंशी राजाओं का शासन स्थापित हुआ।

किंतु, वह प्राचीन सिरमौरी ताल कभी अपने मूल वैभव को प्राप्त न कर सका।

वर्ष-दर-वर्ष उस ताल का पानी सूखता चला गया। आज भी यदि आप उस भूमि पर जाएं, तो दलदल और सूखती हुई रेतीली परतें यह स्पष्ट दर्शाती हैं कि प्रकृति ने उस स्थान को अपने वात्सल्य से वंचित कर दिया है।

घास, झाड़ियों और मिट्टी की परतों के बीच से झांकते महलों के प्राचीन प्रस्तर खंडहर आज भी धूप और जाड़े में मूक खड़े दिखाई देते हैं। वे पत्थर मात्र मलबा नहीं हैं; वे एक अभिशप्त साम्राज्य की कांपती आत्माएं हैं, जो सदियों से मौन खड़े होकर केवल एक ही प्रतीक्षा कर रहे हैं—मुक्ति की प्रतीक्षा! अपने उस पातक के प्रायश्चित की राह, जिसका मार्ग आज तक किसी को नहीं मिल सका।

परंतु, जो बात इतिहास के पन्नों से खो जाती है, उसे देवभूमि का लोक-हृदय कभी मरने नहीं देता।

सिरमौर के गिरिपार अंचल में आज भी जाड़ों की रातों में जब अलाव जलते हैं, या पारंपरिक मेलों में हुड़क और खंजरी की थाप गूंजती है, तो बुजुर्गों के कंठ से यह कारुणिक लोक-गीत बरबस फूट पड़ता है:

"सूकी गया ताले रा पाणी, रूठी गईं माँ गिरिजा,
रातो-रात डूबी गई राजा री सिरमौरो री ढाणी...
नटनी रा आंसुड़ा देखो, अझै बी नी बीसरिया,
आर टोका पार पोका, कोई नी फेर बसिया..."

(अर्थात्: ताल का जल सूख गया और माँ गिरिजा सदा के लिए रूठ गईं... राजा की पूरी राजधानी एक रात में विलीन हो गई। उस नटनी के छलके आंसुओं को यह घाटी आज तक नहीं भूल पाई है; टोका और पोका के बीच का वह संताप आज भी लोकस्मृति में सजीव है।)

राजा मदन सिंह का साम्राज्य धूल में मिल गया, उनका नाम कायरता और छल के प्रतीक के रूप में दर्ज हुआ। किंतु, वह निर्भीक, स्वाभिमानी नटनी लोकगीतों, नाटियों और पहाड़ी गाथाओं में अमर हो गई। वह अब केवल एक नर्तकी नहीं, बल्कि उस पहाड़ी अस्मिता का प्रतीक बन चुकी है जो यह सिखाती है कि कला का मोल किसी राजा की जागीर से कहीं अधिक ऊंचा होता है।

खंडहर आज भी मुक्ति की बाट जोह रहे हैं, और सूखता ताल उस प्राचीन पाप का साक्षी बना खड़ा है।

किंतु इस पूरे ऐतिहासिक महाकाव्य का वह सर्वोच्च दार्शनिक निष्कर्ष क्या है? क्यों यह घटना भारत भूमि के उस सनातन मूल्य की गवाही देती है जहाँ रघुकुल की मर्यादा प्राण देकर भी वचन की रक्षा सिखाती है?

जानने के लिए जुड़े रहें इस श्रृंखला के अंतिम एवं निर्णायक अंक से—

अंक 7: शाप से अभिशाप: मर्यादा का सनातन पाठ (उपसंहार)

✍️ - मधु शर्मा 

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