अंक 1: वैभव की नगरी और गिरि का किनारा
क्या सत्ता का दंभ और एक अविवेकी प्रण किसी हंसते-खेलते साम्राज्य को रातों-रात जलमग्न कर सकता है? जानिए देवभूमि हिमाचल के सिरमौर की उस पावन सरिता की अनकही गाथा, जहाँ एक स्वाभिमानी कलाकार के छलपूर्ण अंत ने प्रकृति को भी रुद्र बना दिया था।
देवभूमि हिमाचल के भाल पर मुकुट की भांति सुशोभित सिरमौर धरा का इतिहास जितना गौरवशाली रहा है, उतना ही अपने भीतर एक मूक और रहस्यमयी वेदना को समेटे हुए है। समय के चक्र को यदि पीछे घुमाकर ग्यारहवीं सदी के कालखंड में ले जाएं, तो यह घाटी आज जैसी शांत नहीं, बल्कि अपार वैभव, आध्यात्मिक तेज और स्थापत्य की भव्यता से आलोकित थी।
पर्वतराज हिमालय के कुपड़ शिखर से निकली पावन सरिता 'गिरिगंगा'—जिसे साक्षात मां पार्वती (गिरिजा) का वात्सल्य स्वरूप माना गया—अपनी फेनिल, धवल लहरों के साथ घाटी को सींचती हुई बहती थी। नदी की हर लहर में ऐसा सम्मोहन था मानो कोई रूपवती नूपुरों की रुनझुन पर थिरकते हुए संस्कृति, कला और समृद्धि का अमृत बांट रही हो।
इसी पावन जलधारा के आंचल में बसी थी तत्कालीन सिरमौर राज्य की समृद्ध राजधानी—सिरमौरी ताल।
नागर शैली के गगनचुंबी प्रस्तर मंदिर, सूर्य की पहली किरण के साथ दमकते स्वर्ण-कलश और गिरि-बाटा घाटी के उपजाऊ मैदान। यह नगर तत्कालीन समय में व्यापार का एक विशाल केंद्र था, जहाँ तिब्बत, कश्मीर और मैदानी क्षेत्रों के व्यापारी अपने कारवां के साथ आते थे। संध्या होते ही मंदिरों के शंखनाद और धूप-लोबान की सुगंध पूरे वातावरण को किसी देवलोक में परिवर्तित कर देती थी।
यहाँ के लोकजीवन का प्राण था संगीत। उत्सवों के समय जब ढोल-दमामे और हुड़क की थाप पड़ती, तो वादियों में पारंपरिक नाटी के यह बोल स्वतः गूंज उठते थे:
झूमी-झूमी नाचे सारी सिरमौरो री ढाणी..."
प्रकृति, प्रजा और सरिता के बीच यह एकाकार रूप ही सिरमौर की वास्तविक शक्ति था।
किंतु, इतिहास साक्षी है कि जब-जब सत्ता की सीमाएं मर्यादा लांघती हैं, तब-तब विनाश की नींव पड़ती है। सिरमौरी ताल के राजसिंहासन पर विराजमान थे राजा मदन सिंह। राजा पराक्रमी थे, प्रजावत्सल भी कहलाते थे, परंतु उनके अंतःकरण में सत्ता और वैभव का एक सूक्ष्म अहंकार धीरे-धीरे जड़ें जमा चुका था। चाटुकारों की निरंतर प्रशंसा ने राजा को यह भ्रम दे दिया था कि सिरमौर की सीमाओं के भीतर राजा का वचन ही अंतिम सत्य है—वे यह विस्मृत कर बैठे कि प्रकृति और नियति के विधान के आगे बड़े-बड़े चक्रवर्ती सम्राट भी तिनके मात्र होते हैं।
उसी भरे दरबार में एक दिन पैंजनों की हल्की, खनकती ध्वनि के साथ एक रूपवती और स्वाभिमानी नटनी का पदार्पण होता है। साधारण वस्त्र, किंतु आंखों में कला की कठोर साधना से उपजा एक असाधारण तेज।
वह मात्र एक करतब दिखाने वाली कलाकार नहीं थी; वह हवा के रुख को साधने वाली ऐसी वीरांगना थी जिसने संतुलन और सत्य को ही अपना धर्म मान लिया था।
दरबार के वैभवशाली विलास और उस निर्भीक कलाकार के मध्य की दृष्टि-टकराहट ने एक अनकहे तनाव को जन्म दे दिया। गिरिगंगा के उफनते पाट के ऊपर अब एक ऐसी विनाशकारी शर्त आकार लेने जा रही थी, जिसे न तो राजा का अहंकार पीछे खींच सकता था और न ही नटनी का स्वाभिमान।
वह शर्त क्या थी जिसने एक समृद्ध साम्राज्य के ऊपर प्रलय की काली छाया खींच दी?
जानने के लिए जुड़े रहें इस ऐतिहासिक और मार्मिक गाथा के अगले अंक से—
अंक 2: हवा में तनी डोरी और राजहठ की शर्त
✍️ - मधु शर्मा
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नटनी के शाप से अभिशप्त सिरमौर ताल की रोचक कथा। हर किसी को सिरमौर हिमाचल प्रदेश का ये इतिहास जानना चाहिए।
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