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गिरी का काला नीर: एक नटनी का शाप अंक 7

शाप से अभिशाप: मर्यादा का सनातन पाठ (उपसंहार)

जब रघुकुल की मर्यादा प्राण देकर भी वचन निभाने की सीख देती है, तब एक राजा का कायरतापूर्ण छल पूरे साम्राज्य को भस्म कर देता है। जानिए इस ऐतिहासिक त्रासदी का वह शाश्वत दार्शनिक निष्कर्ष, जो सदियों से सिरमौरी ताल के सूखते नीर में मुक्ति की राह खोज रहा है!

उस प्रलयंकारी काल-रात्रि को गिरिगंगा की उत्ताल तरंगों में समाती एक स्वाभिमानी वीरांगना के कंठ से निकला आक्रोष केवल वाणी का एक क्षणिक शाप नहीं था। वह काल के भाल पर खिंची वह अमिट रेखा थी, जो सिरमौरी ताल की पावन धरा के लिए एक अंतहीन, दारुण अभिशाप बन गई।

शाप वह बाण था जो उस क्षण छूटा, किंतु अभिशाप वह दीर्घकालिक संताप है जिसे वह भूमि आज एक सहस्राब्दी बीत जाने के बाद भी भोग रही है।

सदियां बीत चुकी हैं। अनेक राजवंश आए और चले गए, साम्राज्य बने और ढह गए, किंतु गिरि नदी के तट पर पसरा वह वीराना, वह सूखता हुआ ताल और झाड़ियों के बीच दफन प्रस्तर खंडहर आज भी उस पातक की मूक गवाही दे रहे हैं। डूबी हुई उस प्राचीन राजधानी की आत्मा को आज तक कोई मुक्ति का मार्ग नहीं मिल सका। वह भूमि आज भी प्रायश्चित के आंसुओं में मौन सिसक रही है।

किंतु यह ऐतिहासिक त्रासदी केवल एक कथा भर नहीं है; यह भारत भूमि के सनातन चिंतन का एक अत्यंत प्रखर और चेतावनी भरा दर्पण है।

हमारी सनातन संस्कृति का मूल आधार मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम का आदर्श चरित्र है। रघुकुल की वह अमर मर्यादा पूरे विश्व को यह सिखाती है:

"रघुकुल रीति सदा चलि आई,
प्रान जाहुं बरु बचनु न जाई॥"

प्रभु श्री राम ने पिता के एक साधारण वचन का मान रखने के लिए अयोध्या के राजसिंहासन, स्वर्ण-प्रासादों और समस्त सुखों को तिनके के समान त्याग दिया और चौदह वर्ष वनों की धूल फांकना स्वीकार किया। उन्होंने सिखाया कि राज्य चले जाएं, प्राण संकट में पड़ जाएं, किंतु धर्म और सत्य की मर्यादा खंडित नहीं होनी चाहिए।

इसी पावन धरा पर पितामह भीष्म ने वह भीषण प्रतिज्ञा ली थी, जिसने इतिहास की दिशा बदल दी। जीवन भर विषम से विषम परिस्थितियां आईं, अनेक व्यक्तिगत संताप झेलने पड़े, किंतु भीष्म ने अपने वचन की रक्षा के लिए कभी छल, कपट या कायरता का मार्ग नहीं चुना।

इसके ठीक विपरीत, सिरमौर के राजा मदन सिंह का चरित्र खड़ा दिखाई देता है।

राजा ने पहले तो राजमद और अहंकार के वशीभूत होकर बिना सोचे-समझे एक असंभव प्रण लिया। और जब उस स्वाभिमानी साधिका ने अपनी साधना के बल पर उस असंभव को संभव कर दिखाया, तो राजा का अंतःकरण आधा राज्य छिन जाने के भय से कांप उठा। मर्यादा की रक्षा करने के बजाय राजा ने अधर्म और छल का कायरतापूर्ण मार्ग चुना।

यदि राजा मदन सिंह अपने वचन पर अडिग रहते और आधा राज्य उस नटनी को सौंप देते, तो क्या होता?

अधिक से अधिक राज्य की भौगोलिक सीमाएं आधी रह जातीं। किंतु सिरमौर का मस्तक सत्य और मर्यादा के गौरव से आकाश छू रहा होता! वह समृद्ध राजधानी, वे भव्य नागर शैली के मंदिर, वे निर्दोष प्रजाजन और वह पावन संस्कृति जलप्रलय की विभीषिका में नष्ट होने से बच जाती।

राजा के एक कायरतापूर्ण छल ने केवल एक निर्दोष की जान नहीं ली, बल्कि समूचे कुल, राजधानी और आने वाली पीढ़ियों के भाग्य को माँ गिरिजा के रुद्र-प्रकोप में होम कर दिया।

सनातन धर्म की शाश्वत सीख:

यह गाथा हमें जीवन का सबसे कठोर सत्य सिखाती है—

विवेकपूर्ण संकल्प:  कभी भी दंभ, क्रोध या आवेश में आकर ऐसा संकल्प न लें जो मर्यादा के प्रतिकूल हो।

वचन की दिव्यता:  यदि सत्य और धर्म की साक्षी में एक बार कोई प्रण ले लिया जाए, तो प्राणों की बाजी लगाकर भी उस पर अडिग रहना ही सनातन धर्म है।

प्रकृति और निर्दोष का न्याय:  किसी भी निरपराध, असहाय या कलाकार की आत्मा से निकली 'हाय' कभी निष्फल नहीं जाती। छल से अर्जित की गई सत्ता अंततः विनाश का ही कारण बनती है।

आज भी जब आप सिरमौरी ताल के उस शांत टीले पर खड़े होकर गिरिगंगा की मंद पड़ती धारा को देखते हैं, तो हवा के झोंकों में वह शाश्वत संदेश स्पष्ट सुनाई देता है—भौतिक वैभव, राजमुकुट और साम्राज्य सब नश्वर हैं; यदि कुछ अमर रहता है, तो वह केवल सत्य, मर्यादा और धर्म का आचरण है।

✍️ - मधु शर्मा 

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