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गिरी का काला नीर: एक नटनी का शाप

अंक 4: जलप्रलय की काली रात और डूबता साम्राज्य

जब छल की सीमाएं मर्यादा का सीना चीर देती हैं, तब दया नहीं, महाकाल का दंड उतरता है। पढ़िए उस प्रलयंकारी काल-रात्रि का वृत्तांत, जब माँ गिरिजा के रौद्र रूप ने एक ही प्रहार में अभिमानी साम्राज्य को ताश के पत्तों की तरह जलमग्न कर दिया!

नटनी के कंठ से निकले अंतिम शब्द कोई साधारण ध्वनि नहीं थे—वे ब्रह्मांडीय न्याय की भीषण हुंकार थे।

जैसे ही वह लहूलुहान देह गिरिगंगा के गर्भ में विलीन हुई, समूची प्रकृति ने स्तब्ध होकर करवट ली। कुपड़ शिखर से लेकर गिरि-बाटा की तलहटी तक की वायु एकाएक भारी और विषाक्त हो उठी। दोपहर का सूर्य काली घटाओं के पीछे ऐसे छिप गया मानो वह इस आने वाले महाविनाश को देखने का साहस न जुटा पा रहा हो।

और फिर, गिरिगंगा का पावन वक्ष फटा!

माँ गिरिजा, जो सदियों से इस घाटी को वात्सल्य और पोषण का अमृत बांट रही थीं, छल और रक्त के स्पर्श से साक्षात संहारक 'रुद्राणी' बन गईं। पर्वतराज के शिखरों पर प्रलयंकारी मेघ गर्जना करने लगे। आकाश से मूसलाधार जल नहीं, मानो वज्र की धाराएं बरसने लगीं।

गिरि नदी का फेनिल, दुग्ध-धवल नीर स्याह कालिख में बदल चुका था। नदी के गर्भ से सौ-सौ हाथ ऊंची जल की काली दीवारें उठीं। पर्वत दरकने लगे, विशाल शिलाखंड तिनकों की तरह लुढ़ककर वेग में समाने लगे।

इस प्रलयंकारी रात और सिरमौर के डूबने की करुण व्यथा को गिरिपार की सदियों पुरानी 'हार' में आज भी स्थानीय गायक हुड़क की थाप पर कांपते स्वरों में गाते हैं:

"गिरि धारा बहे रे कालो पाणी,
रातो-रात डूबी गई सिरमौरो री ढाणी...
महल अटारी सब नीरे में समाए,
नटनी रा बोल कदे खाली नी जाए..."

(अर्थात्: गिरि नदी से काल बनकर काला पानी बह निकला और एक ही रात में सिरमौर की पूरी राजधानी उसमें समा गई... राजमहल और अट्टालिकाएं सब उस अथाह जल में विलीन हो गए, क्योंकि एक सती-साधिका नटनी का वचन कभी निष्फल नहीं जाता।)

नगर में चीत्कार गूंज उठी।

जो दरबारी कुछ क्षण पूर्व तक राजा के छल पर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे, वे भय से पीले पड़कर पागलों की भांति इधर-उधर भागने लगे। किंतु भागते कहाँ? चारों दिशाओं से केवल जल का अट्टहास और मृत्यु की गर्जना थी।

राजमहल की ओर जब जल की पहली प्रचंड लहर टकराई, तो शताब्दियों पुराना स्थापत्य, नागर शैली के भव्य प्रस्तर खंभे और स्वर्ण-कलश ताश के पत्तों की तरह भरभराकर ढह गए। वैभव, संपदा, विलास और सत्ता का सारा मद एक ही झटके में कीचड़ और मलबे के नीचे दब गया।

राजा मदन सिंह अपने राजमुकुट को थामे असहाय खड़े थे। जिन भुजाओं पर सेनाओं का अभिमान था, वे आज प्रकृति के इस रौद्र तांडव के सम्मुख निष्प्राण थीं। राजा की अंतिम चीख को गिरि के उफनते थपेड़ों ने अपने जबड़े में खींच लिया। न कोई दरबारी बचा, न राजपरिवार, न सेना—अधर्म और विश्वासघात का विष पीने वाली वह पूरी व्यवस्था अपनी ही करनी की गति को प्राप्त हो गई।

चीखें धीरे-धीरे शांत हुईं। जल का वेग सब कुछ निगलकर धीमा पड़ा।

जब भोर का धुंधलका छटा और पहली किरण उस भूमि पर पड़ी, तो वहां कोई राजधानी नहीं थी। न कोई रंगमहल था, न मंदिरों के शिखर। मीलों तक पसरा था केवल एक वीरान, मटमैला दलदल, तैरती हुई बल्लियां और मलबे के ढेर। जिसे सदियों ने सजाया था, उसे एक निर्दोष के आर्तनाद और प्रकृति के न्याय ने एक ही रात में भूगोल से पोंछकर रख दिया।

वह वीभत्स श्मशान अब केवल एक नाम से जाना जाने वाला था—सिरमौरी ताल।

किंतु क्या वह वैभव पूरी तरह मिट गया, या आज भी उस दलदल और संग्रहालयों में इतिहास के साक्ष्य दफन हैं?

जानने के लिए जुड़े रहें इस मार्मिक गाथा के अगले अंक से—

अंक 5: खंडहरों में दबी गवाही और पुरातात्विक साक्ष्य

✍️ -  मधु शर्मा 

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