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गिरी का काला नीर: एक नटनी का शाप

 
अंक 3: छल का वार और वह अंतिम चीख

जब राजमुकुट अपने ही दिए वचन से कांपने लगे, तब जन्म लेता है कायरता का सबसे घिनौना षड्यंत्र। पढ़िए उस विश्वासघात की मर्मभेदी कथा, जहाँ एक तनी हुई रस्सी के कटते ही पावन गिरिगंगा का नीर काल का संहारक काला जल बन गया!


गिरि नदी के दोनों छोरों पर सांसें रुकी हुई थीं। हवा भी मानो उस वीरांगना के पराक्रम को नमन करते हुए थम गई थी।

नटनी दूसरे छोर से पुनः सिरमौरी ताल की ओर लौट रही थी। आधी से अधिक नदी पार हो चुकी थी। उसके पैरों में वही दृढ़ता थी, आंखों में विजय का वही तेज था। कुछ ही पलों में वह राजदरबार के छोर पर पहुंचने वाली थी—अर्थात् आधा सिरमौर राज्य अब राजा के हाथों से निकलकर उस नर्तकी के स्वाभिमान की झोली में जाने ही वाला था।

राजमहल के खेमे में खड़े राजा मदन सिंह का मुख पीला पड़ चुका था। मंत्रियों और दरबारियों की दृष्टि में एक गहरा संशय और कायरता तैर रही थी। जिस रघुकुल की मर्यादा में वचन को प्राणों से ऊपर रखा गया था, उस मर्यादा को राजा मदन सिंह ने अपने अहंकार के आगे बौना मान लिया।

राजा ने अपने अत्यंत विश्वासपात्र वजीर की ओर एक मूक, क्रूर संकेत किया। संकेत स्पष्ट था—राज्य जाना नहीं चाहिए, चाहे धर्म और मर्यादा की बलि ही क्यों न चढ़ जाए!

एक कायर हाथ ने म्यान से धारदार खड्ग निकाला और चुपचाप उस खंभे की ओर बढ़ा जहाँ रस्सी का मुख्य छोर बंधा था।

तड़क!

एक ही झटके में वह तनी हुई डोरी काट दी गई।

हवा में एक चीत्कार गूंजी। संतुलन साधती नटनी के पैरों तले से शून्य भी छिन गया। वह हवा में लहराई और सैकड़ों फीट की ऊंचाई से सीधे नीचे उफनती गिरिगंगा की पाषाणी छाती पर आ गिरी।

छपाक!

लहरों में एक भयानक कंपन हुआ। रक्त की लाल धार ने कुछ क्षणों के लिए गिरि के धवल फेन को रंग दिया। किनारे पर खड़ी मूक प्रजा के मुंह से आह निकल गई। देह टूट चुकी थी, अस्थियां बिखर चुकी थीं, परंतु उस स्वाभिमानी कलाकार की चेतना अब भी जागृत थी।
उसकी आंखों में मृत्यु का कोई भय नहीं था; वहाँ साक्षात आदिशक्ति का रौद्र रूप धधक रहा था।

उसने अपनी लहूलुहान, कांपती हथेलियों में पर्वतराज हिमालय की पुत्री माँ गिरिजा (गिरिगंगा) का पवित्र संकल्प-जल उठाया। शास्त्र साक्षी हैं कि जब किसी परम निर्दोष और पीड़ित आत्मा का आर्तनाद किसी पावन सरिता के जल से मिलता है, तो वह केवल वाणी नहीं रहती, वह ब्रह्मांडीय न्याय का अमोघ अस्त्र बन जाती है।
मरती हुई नटनी ने अपनी अंतिम सांसों को बटोरकर उस अभिमानी राजमहल और मौन खड़ी प्रजा की ओर देखा। उसकी वाणी किसी गगनभेदी वज्रपात की तरह घाटियों में गूंज उठी:

"आर टोका पार पोका,
डूब मरो रे सिरमौरो रे लोका!"

(इधर टोका और उधर पोका... हे छल की मूक साक्षी बनी प्रजा, तुम सब जलमग्न होकर मिट जाओ! जिस राज्य में कला का मोल छल से चुकाया जाए, उस राज्य का नामोनिशान इस धरती से मिट जाए!)

यह अंतिम शाप देकर उसने माँ गिरिजा की गोद में अपने प्राण त्याग दिए।

और ठीक उसी क्षण, प्रकृति ने करवट ली। दोपहर के उजाले में अचानक दिशाएं अंधी हो गईं। आकाश में स्याह, विकराल मेघ उमड़ पड़े। कुपड़ शिखर की ओर से एक ऐसी भयानक गर्जना सुनाई दी मानो पर्वत का सीना फट गया हो। गिरिगंगा का वह अमृत-तुल्य पावन जल एकाएक मटमैला, काला और प्रलयंकारी रूप धारण करने लगा।

एक निर्दोष का रक्त गिरि के पावन जल में मिलकर काल का संहारक विष बन चुका था। अब प्रकृति का न्याय आरंभ होने वाला था।

उस काली रात में सिरमौरी ताल के राजमहल और प्रजा पर क्या बीती?

जानने के लिए जुड़े रहें इस ऐतिहासिक गाथा के अगले अंक से—
अंक 4: जलप्रलय की काली रात और डूबता साम्राज्य

✍️ - मधु शर्मा 

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टिप्पणियाँ

  1. जब कोई अयोग्य राजा कायरता पूर्ण, अपनी विरासत की मर्यादा भंग करता है तो विनाश का सामना जनता को भी करना पड़ता है। सिरमौर की धरा को इस महापाप का कलंक सदियों तक झेलना है।
    अति मार्मिक प्रेरणा दायक प्रसंग है। अवश्य पढ़ें।

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