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प्रतिभा की 'न्यायिक हत्या': डॉ. वैभव जैन और तंत्र का षड्यंत्र

  " समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।"  — रामधारी सिंह 'दिनकर' एक मेधावी का 'अपराध' और प्रतिशोध की ज्वाला: वर्ष 2012, इंदौर मेडिकल कॉलेज। डॉ. वैभव जैन, एक ऐसा छात्र जिसकी आँखों में सुनहरे भविष्य के सपने थे। उनका 'गुनाह' केवल इतना था कि उन्होंने अपनी सहपाठी नेहा वर्मा की उस अनैतिक मांग को ठुकरा दिया, जिसमें उन्हें अपनी बहन की जगह बैठकर प्रवेश परीक्षा में नकल करवानी थी। सत्य पर अडिग रहने का दंड क्या मिला? एक सुनियोजित षड्यंत्र! कानून जब 'कसाई' बन गया: नेहा ने वैभव के नाम से एक फर्जी फेसबुक प्रोफाइल बनाई, उस पर अश्लील सामग्री डाली और फिर भारत के सबसे खतरनाक हथियार—SC/ST Act—का उपयोग किया। बिना किसी प्राथमिक जांच के, बिना डिजिटल साक्ष्यों की पुष्टि किए, पुलिस ने वैभव को दबोच लिया। (चित्र [image_12.png] में जंजीरों पर "SC/ST Act" की तख्ती इसी भयावहता को दर्शाती है।) मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की पराकाष्ठा: 50 दिन की कालकोठरी : एक डॉक्टर बनने का सपना देखने वाला युवक अपराधियों के बीच सड़ने को मज...
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भगवती वंदना और नूतन वर्ष शुभकामना

  जयति जय जय माँ जगदम्बा, दुःख-दारिद्र्य विनाशिनी। शुभ्रवसना सुहासिनी, जन-मन-सिंहासन वासिनी॥ कर जोड़ि "मधु" वंदन करे, भक्ति-भाव उर धारि के। तव शरण माँ मोहि राखियो, हरहु सब कष्ट निवारि के॥ चैत्र नवरात्रि पुनीत बेला, सजे घर-घर माँ के द्वार। शक्ति स्वरूपा सिद्धिदात्री, करहु सब पर कृपा अपार॥ नूतन संवत्सर हो मंगल, हर्षित हो अब सकल जहान। सुख-समृद्धि वैभव बढ़े, मान-सम्मान बढ़े कीर्ति महान॥ "मधु शर्मा" की ओर से आप सभी को, चैत्र नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं। और नूतन वर्ष मंगलमय हो! ✍️ — मधु शर्मा #हिंदू_नव_वर्ष #VedaRicha_ #सनातन_वैदिक_धर्म #चैत्र_नवरात्रि #विक्रम_संवत_2083 #रौद्र_संवत्सर

नव-संवत्सर २०८३: चैत्र नवरात्रि पर्व

उठो धरा के वीर सुतों, देखो नव वर्ष आया है, तरु-पल्लव ने केसरिया बाना, अंग-अंग सजाया है। नई कोपलों की लाली में, छिपी सूर्य की ऊष्मा है, फलों-फूलों के वैभव में, धरती बनी सगुप्मा है! खेतों में जो लहरातीं फसलें, वह स्वर्णमयी श्रृंगार हैं, झूम रही प्रकृति पाकर, ऋतुराज का अलंकार है। नन्हे खग का कलरव देखो, जैसे बजती भेरी हो, नवल वर्ष की बेला में, अब तनिक न कोई देरी हो! चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा, गुरुवार का वह स्वर्ण-क्षण, उन्नीस मार्च की भोर में सजा, नवल वर्ष का अभिनंदन। रौद्र नाम संवत्सर का, तेरह मासों की माया है, पुरुषोत्तम का अधिक मास, इस वर्ष धरा पर आया है! और देखो, नभ से उतरी, जगदम्बा की सत्ता है, नारी-शक्ति के चरणों में, झुकता हर इक पत्ता है। भक्ति और शक्ति का यह, पावन मेल निराला है, नवरात्रि के दीपों ने, मन का तिमिर निकाला है! विक्रम संवत की विजय-ध्वजा, अंबर तक फहराने दो, हिन्दू नव-उत्कर्ष का पावन, शंखनाद हो  जाने दो। नमन करो उस महाशक्ति को, जो सृष्टि का आधार है, प्रसन्नता के इस उत्सव में, रचा-बसा संसार है! मधु शर्मा की ओर से आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

स्वतंत्रता का भ्रम या पहचान का अंत? : रिद्धि और मोनालिसा की दास्ताँ

आज के आधुनिक युग में 'स्वच्छंदता' और 'व्यक्तिगत पसंद' के नाम पर अक्सर अपनी जड़ों को काटने की होड़ मची है। लेकिन क्या यह तथाकथित आधुनिकता हमें सुरक्षा और सम्मान की ओर ले जा रही है, या फिर एक ऐसे अंधेरे की ओर जहाँ पहुँचकर व्यक्ति का अपना सामाजिक और पारिवारिक अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है? आज का यह लेख दो ऐसी ही घटनाओं पर आधारित है जो समाज की आँखें खोलने के लिए पर्याप्त हैं। रिद्धि जाधव: पंख काटकर पिंजरे का चुनाव? इंडिगो एयरलाइंस की पूर्व एयरहोस्टेस रिद्धि जाधव, जो कभी खुले आसमान में उड़ती थीं और अपनी आधुनिक जीवनशैली के लिए जानी जाती थीं, आज 'आयशा शेख' के रूप में अपनी पहचान खो चुकी हैं। जो युवती कभी अपनी मर्जी के पहनावे और स्वच्छंद विचारों के साथ दुनिया के सामने आती थी, वह आज बुर्के की काली परतों में सिमट गई है। यह केवल एक विवाह नहीं, बल्कि एक पूरी जीवनशैली और विचारधारा का पूर्ण आत्मसमर्पण है। जिस सनातन की उदारता को ठुकराकर उन्होंने इस जकड़न को चुना, क्या आज वह अपनी उस 'आधुनिक' छवि को याद कर पाती होंगी? जब बच्चा भी उसी कट्टरता के सांचे में ढलने लगता है, तब प्रश...

श्रीमद्भगवद्गीता: काव्य सार प्रथम अध्याय: अर्जुनविषादयोग

  ॐ  अथ श्री। श्री गणेशाय नमः। धृतराष्ट्र उवाच: धृतराष्ट्र पूछे संजय से, हो व्याकुलता से त्रस्त, धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में भाग्य किसका उदय और अस्त, पांडु-पुत्र और मेरे सुत, रण की इच्छा लिए खड़े, कुरुक्षेत्र की उस माटी पर, कौन-कौन से वीर अड़े?" संजय उवाच : संजय बोले, "हे राजन! रणभेरी अब बज उठी प्रचंड, एक ओर अधर्म खड़ा, दूजी ओर सत्य का ध्वज अखंड। भीष्म, द्रोण और कृप खड़े, कौरव की शक्ति का मान, पर पांडव दल के रक्षक हैं, स्वयं कृष्ण भगवान।" कुरुक्षेत्र की रणभूमि में, बज उठे थे रण के शंख, देख सम्मुख बंधु-बांधव, कैसे सहूंगा इनके वध का कलंक। एक ओर था धर्म खड़ा, दूजी ओर मोह का जाल, पार्थ के हाथ से छूटा गांडीव, देख अपनों का ही काल। अर्जुन उवाच: हे केशव! सम्मुख खड़े, सब मेरे ही मान। तात, भ्राता और गुरुवर, जिनसे मेरी पहचान॥ विजय मिले या राज्य मिले, क्या मूल्य उस जीत का? अपनों के ही रक्त से सिंचित, क्या अर्थ ऐसी धरा की प्रीत का? थर-थर कांपे गात वीर के, मुख भी उसका सूख गया, रण का धीर, धनुर्धर आज, मोह के आगे झुक गया। बीच रणभूमि खड़ा हुआ, गांडीवधारी का रथ महान, सारथी बने स्वयं जगदीश्...

ऋण की वसूली या अंतिम विदाई? एक माँ की पुकार और संसार की नश्वरता

 संसार एक रंगमंच है, जहाँ हम सब अपनी भूमिका निभाने आते हैं। लेकिन कभी-कभी कुछ भूमिकाएँ इतनी कठिन होती हैं कि वे हमें जीवन के असली अर्थ और 'परम शक्ति' के अस्तित्व का साक्षात्कार करा देती हैं। हाल ही में गाजियाबाद के हरीश राणा का प्रसंग और उनकी माँ का वह विदाई वीडियो देखकर मन में एक गहरा वैराग्य उत्पन्न हुआ है।  विज्ञान की हार, प्रारब्ध की जीत   हम अहंकार में कहते हैं कि "मैं कर लूँगा", "मैं बचा लूँगा"। विज्ञान ने मशीनें बनाईं, कानून ने नियम बनाए, लेकिन 13 वर्षों तक कोमा (PVS) में पड़े उस युवक के प्राणों पर किसी का वश नहीं चला। जब विधाता की डोर खिंचती है, तो बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ और संचित धन-दौलत धरे के धरे रह जाते हैं। क्या यह विज्ञान की हार नहीं? क्या यह उस ईश्वर की इच्छा का प्रमाण नहीं कि साँसें देना और लेना केवल उसी के हाथ में है?   ऋण का लेन-देन:  एक मर्मस्पर्शी सत्य इस प्रसंग को देख ऐसा प्रतीत होता है मानो यह पिछले जन्म का कोई गहरा 'लेन-देन' था। माता-पिता ने अपनी पूरी कमाई, अपनी रातों की नींद और अपने जीवन के 13 बहुमूल्य वर्ष उस बच्चे पर न्योछावर ...