सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

श्रीमद्भगवद्गीता: काव्य सार प्रथम अध्याय: अर्जुनविषादयोग

 


ॐ 

अथ श्री।

श्री गणेशाय नमः।


धृतराष्ट्र उवाच:


धृतराष्ट्र पूछे संजय से, हो व्याकुलता से त्रस्त,

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में भाग्य किसका उदय और अस्त,

पांडु-पुत्र और मेरे सुत, रण की इच्छा लिए खड़े,

कुरुक्षेत्र की उस माटी पर, कौन-कौन से वीर अड़े?"


संजय उवाच:


संजय बोले, "हे राजन! रणभेरी अब बज उठी प्रचंड,

एक ओर अधर्म खड़ा, दूजी ओर सत्य का ध्वज अखंड।

भीष्म, द्रोण और कृप खड़े, कौरव की शक्ति का मान,

पर पांडव दल के रक्षक हैं, स्वयं कृष्ण भगवान।"


कुरुक्षेत्र की रणभूमि में, बज उठे थे रण के शंख,

देख सम्मुख बंधु-बांधव, कैसे सहूंगा इनके वध का कलंक।

एक ओर था धर्म खड़ा, दूजी ओर मोह का जाल,

पार्थ के हाथ से छूटा गांडीव, देख अपनों का ही काल।


अर्जुन उवाच:

हे केशव! सम्मुख खड़े, सब मेरे ही मान।

तात, भ्राता और गुरुवर, जिनसे मेरी पहचान॥

विजय मिले या राज्य मिले, क्या मूल्य उस जीत का?

अपनों के ही रक्त से सिंचित, क्या अर्थ ऐसी धरा की प्रीत का?


थर-थर कांपे गात वीर के, मुख भी उसका सूख गया,

रण का धीर, धनुर्धर आज, मोह के आगे झुक गया।

बीच रणभूमि खड़ा हुआ, गांडीवधारी का रथ महान,

सारथी बने स्वयं जगदीश्वर, मुख पर सूर्य सम तेज महान।


"हे मधुसूदन! नहीं लड़ूँगा", कह रथ पीछे बैठ गया,

पुरखों का वह शौर्य-तज, निश्चल होकर ठहर गया।

स्वजन देख विचलित हुआ, जो था काल का भी काल,

उलझ गया है आज पार्थ, बुनकर ममता का मायाजाल।


त्याग धनुष और बाण को, पार्थ हुए आज हतबुद्ध,

मोह-पाश में बंध गए, भूल गए वह धर्म-युद्ध।

किंतु यही तो अंत नहीं, यह तो ज्ञान की है शुरुआत,

जहाँ समर्पण जन्म ले, वहीं मिटती अज्ञान की रात।


त्याग गांडीव को अर्जुन बैठे, निस्तेज हुआ था रूप

आरंभ में ही था विषाद उपजा, देख महायुद्ध कुरूप॥


ॐ ॐ ॐ 



✍️ — मधु शर्मा


#श्रीमद्भगवद्गीता

#अर्जुनविषादयोग

#काव्य_सार

#VedaRicha_

टिप्पणियाँ

  1. श्रीमद्भगवद् गीता जी का काव्यरूप सार अति सुंदर वर्णित है। साधुवाद।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

नेहरू काल और सांस्कृतिक आघात: पंचांग से लेकर हिंदू कोड बिल तक का 'काला सच'

किसी भी राष्ट्र की जीवंतता उसकी जड़ों और उसकी प्राचीन संस्कृति में निहित होती है। लेकिन स्वतंत्र भारत के शुरुआती दशकों में, आधुनिकता और 'धर्मनिरपेक्षता' के नाम पर जिस तरह से भारत की सनातन परंपराओं पर प्रहार किया गया, वह आज के जागरूक समाज के लिए एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। क्या वह सुधार था या भारत की आत्मा को मिटाने की एक सोची-समझी साजिश? 1 . 22 मार्च 1957: भारतीय पंचांग के साथ 'विदेशी' मिलावट: 22 मार्च 1957 का दिन भारतीय इतिहास में एक ऐसे मोड़ के रूप में याद किया जाएगा, जब भारत की वैज्ञानिक गणना वाली काल-निर्धारण पद्धति (विक्रम संवत) की उपेक्षा कर 'शक संवत' को राष्ट्रीय पंचांग घोषित किया गया और साथ में विदेशी 'ग्रेगोरियन कैलेंडर' को प्रशासनिक कार्यों पर थोप दिया गया। साजिश का पहलू : हज़ारों वर्षों से भारत के ऋषि-मुनियों ने नक्षत्रों और सौर-चंद्र गतियों के आधार पर जो सटीक गणना की थी, उसे 'अवैज्ञानिक' या 'पिछड़ा' बताकर किनारे कर दिया गया। एक ऐसे देश में जहाँ हर त्यौहार और खेती की पद्धति पंचांग से जुड़ी थी, वहाँ विदेशी कैलेंडर थोपना सांस्कृतिक वि...

भाग्य का विधाता: स्वयं मनुष्य (प्रारब्ध, पुरुषार्थ और हमारी पांच इंद्रियां)

" नर नाहर, अपनी शक्ति जगा, खम ठोंक, नियति को राह दिखा! तू भाग्य-लेखक, तू ही विधाता, कर्मों की स्याही से गाथा गा!" क्या आपने कभी सोचा है कि जिसे हम 'भाग्य' कहकर हार मान लेते हैं, क्या वह वास्तव में ईश्वर द्वारा लिखित कोई अटल दस्तावेज है? क्या परमात्मा ने हमें केवल परिस्थितियों का दास बनने के लिए इस नश्वर संसार में भेजा है? कदापि नहीं! ईश्वर ने हमें दृष्टि दी, सामर्थ्य दिया और पांच इंद्रियों का वह अमोघ अस्त्र दिया जिससे हम स्वयं अपने प्रारब्ध को चुनौती दे सकें। प्रारब्ध: केवल एक मंच   परमात्मा किसी का भाग्य नहीं लिखता। वह तो केवल एक न्यायप्रिय विधाता है जो हमारे पूर्व संचित 'प्रारब्ध' के अनुसार हमें एक यथोचित स्थान, परिवार और शरीर देकर इस कर्मक्षेत्र में उतार देता है। प्रारब्ध वह 'कैनवस' है जो हमें मिला है, लेकिन उस पर रंग भरकर उसे 'उत्कृष्ट चित्र' बनाना या 'धब्बा', यह पूर्णतः हमारे वर्तमान कर्मों पर निर्भर है। इंद्रियाँ: कर्म के दिव्य उपकरण ईश्वर ने हमें जड़ पत्थर नहीं बनाया। उसने हमें पांच इंद्रियाँ दीं ताकि हम संसार का अनुभव करें और विव...

श्रेष्ठता का अहंकार: धर्म या विनाश का मार्ग?

"सिर्फ मेरा रास्ता ही खुदा का रास्ता है और बाकी सब वध के योग्य हैं" — क्या यह विचार किसी ईश्वरीय सत्ता का हो सकता है? या यह मनुष्य के अपने अहंकार की उपज है? आज विश्व जिस अशांति और वैमनस्य की आग में जल रहा है, उसका मूल कारण किसी धर्म की शिक्षा नहीं, बल्कि यह 'डॉक्ट्रीन' (Doctrine) है कि "मैं श्रेष्ठ हूँ और सिर्फ मैं ही श्रेष्ठ रहूँ।" जब 'स्व' का सम्मान 'दूसरे' के तिरस्कार में बदल जाता है, तो वहीं से कट्टरता का जन्म होता है। कोरे कागज़ पर नफ़रत की इबारत एक बच्चा जब जन्म लेता है, तो वह एक कोरा कागज़ होता है। उसके पास न कोई संप्रदाय होता है, न कोई शत्रु। उसे समाज, माहौल और शिक्षा यह सिखाते हैं कि उसे किसे प्रेम करना है और किससे घृणा। यदि बचपन से ही यह बीज बोया जाए कि "हमारा मत ही एकमात्र सत्य है," तो वह बच्चा बड़ा होकर सत्य का खोजी नहीं, बल्कि एक कट्टर योद्धा बनता है। सहिष्णुता (Tolerance) पर्याप्त नहीं है अक्सर हम 'सहिष्णुता' की बात करते हैं। लेकिन सहिष्णुता का अर्थ है— "मैं तुम्हें बर्दाश्त कर रहा हूँ।" सच्चा धर्म सहिष्ण...