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जानिए अपने सप्तऋषियों को (अंक - 2)

काल-चक्र, मन्वंतर और नामों का शास्त्रीय रहस्य: 'सप्तर्षि' एक ब्रह्मांडीय पदवी

अक्सर जब जिज्ञासु पाठक विभिन्न पुराणों और संहिताओं का अध्ययन करते हैं, तो उनके मन में एक स्वाभाविक संशय उभरता है—कहीं सप्तऋषियों में मरीचि और अंगिरा के नाम मिलते हैं, कहीं विश्वामित्र और जमदग्नि के, तो कहीं चाक्षुष मन्वंतर में भृगु और सुधामा के। क्या यह ग्रंथों का विरोधाभास है?

उत्तर है: कदापि नहीं। यह भारतीय काल-गणना (Cosmic Time-Cycle) की वह अद्भुत और व्यवस्थित प्रणाली है, जिसे समझे बिना हम वैदिक खगोल और इतिहास को नहीं समझ सकते।

'सप्तर्षि' व्यक्ति नहीं, ब्रह्मांडीय पदवी (Cosmic Office) है

सनातन दर्शन के अनुसार 'सप्तर्षि' किसी एक देहधारी व्यक्ति का स्थायी नाम नहीं, अपितु एक अत्यंत उच्च ब्रह्मांडीय पदवी (Cosmic Office) है। जिस प्रकार किसी लोकतांत्रिक या प्रशासनिक व्यवस्था में पद वही रहता है किंतु कालक्रम के साथ उस पर आसीन होने वाले व्यक्तित्व बदलते रहते हैं, ठीक उसी प्रकार प्रत्येक मन्वंतर के संचालन, धर्म-स्थापन और ज्ञान के संवहन हेतु सात श्रेष्ठ ऋषियों को यह दायित्व सौंपा जाता है।

विष्णु पुराण में पराशर ऋषि इसका स्पष्ट प्रमाण देते हैं:

मन्वन्तरेषु सर्वेषु सप्त सप्तर्षयः स्मृताः।
मनवस्तत्सुताश्चैव देवाश्चेन्द्रस्तथा स्मृतः॥

(विष्णु पुराण ३.१.४)

भावार्थ: प्रत्येक मन्वंतर में सात ऋषि, मनु, मनु के पुत्र, देवता और उस काल के इंद्र—ये सभी पृथक-पृथक होते हैं और अपने नियत काल तक ब्रह्मांडीय व्यवस्था का संचालन करते हैं।

मन्वंतर चक्र और सप्तऋषियों के नाम-भेद

ब्रह्मा जी के एक 'कल्प' (एक दिन) में १४ मन्वंतर होते हैं। प्रत्येक मन्वंतर लगभग ३० करोड़ ६७ लाख २० हजार सौर वर्षों का एक विशाल काल-खंड होता है।

विभिन्न मन्वंतरों में सप्तऋषियों का स्वरूप इस प्रकार रहा है:

  • प्रथम मन्वंतर (स्वायम्भुव मन्वंतर): सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी के सात मानस पुत्रों ने यह दायित्व संभाला—मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वशिष्ठ।
  • छठा मन्वंतर (चाक्षुष मन्वंतर): वैवस्वत से ठीक पूर्व चाक्षुष मन्वंतर में सप्तऋषि थे—भृगु, नभ, विवस्वान, सुधामा, विरजा, अतिनामा और सहिष्णु।
  • वर्तमान मन्वंतर (वैवस्वत मन्वंतर - सातवां): वर्तमान में जिस मन्वंतर में हम जी रहे हैं, उसके सात नियामक ऋषि हैं—कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ।
  • आगामी मन्वंतर (सावर्णि मन्वंतर - आठवां): शास्त्रों के अनुसार आने वाले मन्वंतर में यह दायित्व संभालेंगे—महर्षि परशुराम, महर्षि वेदव्यास, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, दीप्तिमान, गालव और ऋष्यशृंग।

नाम-भेद के पीछे का दार्शनिक आधार

इस नाम-परिवर्तन के पीछे दो प्रमुख कारण हैं:

  • सृष्टि के युगानुरूप आवश्यकता: प्रत्येक मन्वंतर की सभ्यता, चेतना और चुनौतियां भिन्न होती हैं। इसलिए उस काल में उसी विशिष्ट ज्ञान और तपोबल के संवाहक ऋषियों को सप्तर्षि मंडल में स्थान मिलता है।
  • तप और योग्यता का सम्मान: यह पद किसी वंशानुगत अधिकार से नहीं, बल्कि कठोर तपस्या, ब्रह्मज्ञान और लोक-कल्याण के सर्वोच्च सामर्थ्य से प्राप्त होता है।

उपसंहार

अतः ग्रंथों में मिलने वाले सप्तऋषियों के भिन्न नाम किसी भ्रम का परिणाम नहीं, बल्कि हमारे काल-चक्र की सूक्ष्म वैज्ञानिकता के साक्षी हैं। वर्तमान मन्वंतर के सातों ऋषियों ने हमारे ज्ञान, विज्ञान और जीवन-दर्शन को गढ़ा है।

अगले अंक (अंक - 3) में हम प्रवेश करेंगे एक अत्यंत रोमांचक और दिव्य आख्यान में: महाप्रलय, बीज-संरक्षण और पुनर्सृष्टि। जानेंगे कि जब संपूर्ण पृथ्वी जलमग्न हो गई थी, तब भगवान मत्स्य की नौका पर सवार होकर सप्तऋषियों ने कैसे समस्त वनस्पतियों, औषधियों और वेदों के बीजों को सुरक्षित रखकर नई सभ्यता की नींव रखी।

ऋषि चेतना के इस प्रवाह को संजोएं और जन-जन तक पहुंचाएं।

✍️ - मधु शर्मा

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