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जानिए अपने सप्तऋषियों को (अंक - 3)

महाप्रलय, बीज-संरक्षण और पुनर्सृष्टि: जब सप्तऋषि बने नई सभ्यता के आधारस्तंभ

प्रलय का विचार विश्व की लगभग प्रत्येक प्राचीन संस्कृति में पाया जाता है, किंतु सनातन परंपरा में प्रलय का अर्थ सृष्टि का पूर्ण विनाश नहीं, बल्कि उसका एक चक्रीय पुनर्नवीनीकरण (Cyclical Renewal) है। जब कल्प या मन्वंतर का अंत होता है और जलप्लावन से समूची पृथ्वी आच्छादित हो जाती है, तब यह प्रश्न उठता है कि आने वाले नए युग के लिए जीवन, वनस्पति और ज्ञान की धारा कैसे अक्षुण्ण रहती है?

मत्स्य पुराण, श्रीमद्भागवत महापुराण और महाभारत के वनपर्व में इसका अत्यंत वैज्ञानिक और प्रामाणिक उत्तर मिलता है—सप्तऋषियों द्वारा किया गया महा-बीज संरक्षण।

भगवान मत्स्य का आदेश और प्रलय की नौका

श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कंध में कथा आती है कि चाक्षुष मन्वंतर के अंत में जब प्रलयकारी मेघ उमड़े और समुद्र अपनी सीमाएं लांघने लगा, तब भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण कर सत्यव्रत (जो आगे चलकर वर्तमान मन्वंतर के वैवस्वत मनु बने) को सचेत किया।

भगवान मत्स्य ने उन्हें स्पष्ट निर्देश दिया:

सार्धं ऋषिभिस्तेन सर्वसत्त्वोपबृंहितः।
निरालोके महामोहं प्रविश्यागाधमम्भसि॥
(श्रीमद्भागवत ८.२४.३३)

भावार्थ: हे राजन! तुम समस्त प्रकार की औषधियों, वनस्पतियों और सूक्ष्म जीवों के बीजों को एकत्र करो और सप्तऋषियों के साथ उस विशाल नौका पर आरूढ़ हो जाओ। जब घोर अंधकार और अगाध जल छा जाएगा, तब ऋषियों का ब्रह्मतेज ही तुम्हारा मार्ग प्रशस्त करेगा।

तीन प्रकार के बीजों का संरक्षण: प्राचीन 'जीन बैंक'

सप्तऋषियों का प्रलय-नौका पर उपस्थित होना मात्र एक धार्मिक प्रसंग नहीं है, यह एक अत्यंत उन्नत वैज्ञानिक अवधारणा है। ऋषियों ने नौका में तीन स्तरों पर जीवन का संरक्षण किया:

  • जैविक एवं वानस्पतिक बीज (Botanical Preservation): समस्त दुर्लभ वनस्पतियों, जीवन रक्षक औषधियों और कंद-मूलों के मूल बीजों को सुरक्षित रखा गया, ताकि जल घटने के पश्चात धरती पुनः हरी-भरी हो सके।
  • प्राणी-जगत के सूक्ष्म मूल (Genetic Pool): विभिन्न जीव-जंतुओं के मूल अंशों और सूक्ष्म रूपों को सुरक्षित रखा गया, जिससे जैव-विविधता का संवर्धन हो सके।

  • वेद और विज्ञान का ज्ञान-बीज (Intellectual Preservation): सबसे महत्वपूर्ण था ज्ञान का संरक्षण। खगोल, आयुर्वेद, गणित, यज्ञ-विद्या और वेदों के मूल मंत्रों को ऋषियों ने अपनी स्मृति और चेतना में अक्षुण्ण रखा।

वासुकि का बंधन और नौबंधन शिखर

महाप्रलय के उस प्रचंड वेग में जब दिशाएं लुप्त हो चुकी थीं और प्रचंड झंझावातों से जल थल एक हो चुका था, तब वासुकि नाग को रज्जु (रस्सी) बनाकर उस विशाल नौका को भगवान मत्स्य के सींग से बांध दिया गया।

प्रलयकाल के उस घोर अंधकार में सप्तऋषियों ने समाधिस्थ होकर केवल मंत्र-ध्वनियों से ब्रह्मांडीय संतुलन साधे रखा। महाभारत के अनुसार, जल उतरने पर वह नौका हिमालय के जिस सर्वोच्च शिखर पर बांधी गई, उसे आज भी 'नौबंधन शिखर' (उत्तर हिमालय) के नाम से जाना जाता है।

पुनर्सृष्टि और वर्तमान मन्वंतर का सूत्रपात

जब जल शांत हुआ, तब भगवान मत्स्य ने वेदों का ज्ञान पुनः सप्तऋषियों और मनु को प्रदान किया। इसके पश्चात:

  • सप्तऋषियों ने वैवस्वत मनु के साथ मिलकर मानव धर्म, न्याय और सामाजिक व्यवस्था की आधारशिला रखी।
  • कृषि, औषधि और अग्निहोत्र के नियमों को पुनः जन-कल्याण के लिए स्थापित किया गया।
  • यही कारण है कि सप्तऋषियों को केवल वर्तमान का मार्गदर्शक नहीं, बल्कि समस्त मानव जाति का 'सांस्कृतिक और जैविक पूर्वज' माना जाता है।

उपसंहार

सप्तऋषि वह शाश्वत सेतु हैं, जो बीते हुए कालखंड के ज्ञान और जीवन को आने वाले नए कल्प तक सुरक्षित पहुंचाते हैं। यदि वे प्रलय की उन उत्ताल तरंगों के बीच स्थिर न रहते, तो आज न तो यह जैव-विविधता होती और न ही वेदों की यह पावन ऋचाएं।

अगले अंक (अंक - 4) में हम जानेंगे: वैदिक दर्शन एवं सार्वभौमिक वैश्विक स्वीकार्यता—उपनिषदों में शरीर के सात प्राणों के रूप में सप्तऋषियों का दार्शनिक रूपक और विश्व की प्राचीन सभ्यताओं (ग्रीक, फारसी, चीनी) में उनकी सर्वमान्य उपस्थिति।

ऋषि परंपरा के इस पावन ज्ञान को संजोएं और जन-जन तक पहुंचाएं।

✍️ - मधु शर्मा

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