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जानिए अपने सप्तऋषियों को (अंक - 4)

 

सनातन की सार्वभौमिकता और आदि-स्मृति: वैश्विक प्रलय-आख्यानों का मूल वैदिक बीज और सप्तर्षि दर्शन

सत्य किसी एक भौगोलिक परिधि अथवा कालखंड में बंधकर नहीं रहता। जब कोई सत्य सृष्टि के मौलिक नियमों (ऋत) पर आधारित होता है, तो उसकी अनुगूंज संपूर्ण मानवता की चेतना में स्वतः प्रतिध्वनित होती है।


संसार का तुलनात्मक इतिहास उठाकर देखें, तो यह अकाट्य तथ्य सामने आता है कि सनातन धर्म विश्व का प्राचीनतम धर्म है और समूची पृथ्वी पर जितने भी प्रलय और नौका के आख्यान मिलते हैं, उन सबका मूल स्रोत केवल और केवल वैदिक वांग्मय है। विभिन्न सभ्यताओं और परवर्ती धर्मों ने उसी आदि सत्य को अपने-अपने स्थानीय प्रतीकों और नामों के साथ बाद में संजोया।

विश्व के आख्यानों में सनातन की साझी स्मृति: एक तुलनात्मक अध्ययन

जल-प्रलय और जीवन-रक्षक नौका का प्रसंग विश्व के प्रमुख धर्मग्रंथों में आश्चर्यजनक रूप से एक जैसा मिलता है:
  • सनातन वैदिक मूल (मनु और मत्स्य):  ऋग्वेद के बीज-संकेतों तथा शतपथ ब्राह्मण (१.८.१) में राजा सत्यव्रत (वैवस्वत मनु) का प्रसंग आता है। भगवान मत्स्य के निर्देश पर मनु ने समस्त औषधियों, सूक्ष्म जीवों और सप्तऋषियों के साथ नौका में आश्रय लिया, जो प्रलयोपरांत हिमालय के नौबंधन शिखर पर टिकी।
  • सुमेरिया एवं मेसोपोटामिया (गिलगमेश महाकाव्य):  प्राचीन बाबिलोनियन परंपरा में 'उतनापिश्तिम' की नौका द्वारा जल-प्रलय से जीवन के बीजों की रक्षा का उल्लेख है।
  • यहूदी व ईसाई परंपरा (बाइबल - Genesis):    नूह (Noah) द्वारा विशाल नौका (Ark) बनाकर जीवों के जोड़ों को बचाए जाने और जल शांत होने पर नौका के अरारत पर्वत (Mount Ararat) पर ठहरने की कथा है।
  • इस्लामी परंपरा (क़ुरआन मजीद):     सूरह हूद (११.३७-४४) में हज़रत नूह की किश्ती (सफ़ीना) का विशद वर्णन है, जहाँ ज़मीन से पानी उबलने और नौका के 'अल-जूदी' पर्वत पर टिकने का स्पष्ट उल्लेख है।
भाषाविदों के अनुसार 'मनु' शब्द ही सामी (Semitic) भाषाओं में रूपांतरित होकर 'नुह/नूह' (Noah) बना। यह भाषा-साम्य सिद्ध करता है कि मूल घटना और मूल पुरुष एक ही थे—वैदिक वैवस्वत मनु।

कालक्रम और दार्शनिक परिपक्वता: सनातन की निर्विवाद ज्येष्ठता
ऐतिहासिक कालक्रम की दृष्टि से
:

वैदिक संहिताओं और शतपथ ब्राह्मण की परंपरा उस काल की है जब अन्य सभ्यताओं का लिखित इतिहास प्रारंभ भी नहीं हुआ था।
सुमेरियन परंपराएं ईसा पूर्व तीसरी सहस्राब्दी की हैं, यहूदी-ईसाई आख्यान लगभग १००० से ५०० ईसा पूर्व के हैं, और इस्लामी संदर्भ सातवीं सदी (ईसवी) के हैं।

दार्शनिक स्तर पर अंतर:

परवर्ती सभ्यताओं में प्रलय को केवल ईश्वर का आकस्मिक 'क्रोध' माना गया, जहाँ केवल एक कुल या परिवार की देह की रक्षा हुई।

किंतु सनातन का दर्शन इससे कहीं अधिक वैज्ञानिक और व्यापक है:
  • यहाँ प्रलय कोई क्रोध नहीं, बल्कि काल-चक्र (मन्वंतर परिवर्तन) का चक्रीय पुनर्नवीनीकरण (Cosmic Renewal) है।
  • सबसे महत्वपूर्ण बात—सनातन नौका पर केवल भौतिक देह नहीं थी, अपितु सप्तऋषि उपस्थित थे।
  • ऋषियों की उपस्थिति का अर्थ था—ज्ञान, विज्ञान, वेदों की ऋचाएं, आयुर्वेद, खगोल और प्रकृति के आनुवंशिक बीज (Genetic Pool) का संरक्षण, ताकि जल शांत होने पर नई सभ्यता शून्य से प्रारंभ न हो, बल्कि ऋषियों का ब्रह्मज्ञान तुरंत मानवता का पथ आलोकित कर सके।
उपनिषदों में आध्यात्मिक मर्म: शरीर के सात प्राण

सप्तऋषि केवल खगोलीय पिंड या ऐतिहासिक पूर्वज ही नहीं, बल्कि हमारे शरीर और चेतना के आंतरिक नियामक भी हैं। बृहदारण्यक उपनिषद में शीर्ष के सात ज्ञान-द्वारों को सप्तऋषियों का रूपक दिया गया है:

इमावेव गोतमभरद्वाजौ अयमेव गोतमोऽयं भरद्वाजः।
इमावेव विश्वामित्रजमदग्नी अयमेव विश्वामित्रोऽयं जमदग्निः।
इमावेव वसिष्ठकश्यपावयमेव वसिष्ठोऽयं कश्यपः।
वागेवात्रिर्वाचा ह्यन्नमद्यते॥
(बृहदारण्यकोपनिषद २.२.४)
  • दो कान: गौतम और भारद्वाज (सत्य श्रवण)
  • दो नेत्र: विश्वामित्र और जमदग्नि (दिव्य दृष्टि व तेज)
  • दो नासिका छिद्र: वशिष्ठ और कश्यप (प्राण-वायु संतुलन)
  • जिह्वा/मुख: अत्रि (ज्ञान-वाणी और पोषण)
अर्थात् जो सात ऋषि समूचे ब्रह्मांड के नियम (ऋत) संभालते हैं, वे ही सूक्ष्म रूप से हमारी अंतश्चेतना और प्राण-द्वारों के रक्षक हैं।

विश्व संस्कृतियों में सप्तर्षि तारामंडल की सार्वभौम स्वीकृति

आकाश में चमकता यह सात तारों का पुंज दुनिया की हर प्राचीन संस्कृति का मार्गदर्शक रहा:
  • प्राचीन फारस (ईरान): अवेस्ता में इसे 'हफ़्तौरंग' (सात दिव्य शासक/सिंहासन) कहा गया।
  • यूनान (ग्रीस): इसे 'उर्सा मेजर' और दिशा-सूचक ध्रुव-संधानी तारे माना गया।
  • चीन: इसे 'बेइदौ' (उत्तरी सप्त-सितारे) कहा गया, जो ऋतु-परिवर्तन का आधार था।
उपसंहार

समूचा विश्व जिस महा-प्रलय, जीवन-नौका और सात आकाशीय प्रहरियों को अपनी-अपनी लोक-स्मृतियों में दोहराता आ रहा है, उसका आदि बीज वेदों में सहस्रों वर्ष पूर्व संकलित था। सनातन की सार्वभौमिकता और ज्येष्ठता का इससे बड़ा कोई प्रमाण नहीं हो सकता।
सैद्धांतिक और खगोलीय आधार की इन चार कड़ियों के उपरांत, अब हम प्रवेश करेंगे वर्तमान वैवस्वत मन्वंतर के सातों ऋषियों की पावन चरित्र-गाथा में।

अगले अंक (अंक - 5) में जानिए: महर्षि कश्यप — सृष्टि एवं जैव-विविधता के जनक। कैसे उन्होंने समस्त जीव-जगत, वनस्पति और चेतना का विस्तार कर प्रकृति का संतुलन स्थापित किया।

ऋषि परंपरा के इस पावन ज्ञान को संजोएं और जन-जन तक पहुंचाएं।

✍️ - मधु शर्मा

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