ब्राह्मण फ़ाइल्स अंक २२: शास्त्रों का महाप्रवास — जब प्राण संकट में डालकर ब्राह्मणों ने बचाईं लाखों अमूल्य पांडुलिपियाँ
ग्रन्थाः संरक्षणीयाः स्युः प्राणानामपि संशये।
धर्मस्य मूलं वेदाद्याः तन्नाशे सर्वनाशनम्॥
(प्राचीन सूक्ति — प्राणों पर संकट आने पर भी ग्रंथों की रक्षा की जानी चाहिए; क्योंकि वेद और शास्त्र ही धर्म का मूल हैं, इनके नष्ट होने पर समूची संस्कृति का विनाश हो जाता है।)
धर्मस्य मूलं वेदाद्याः तन्नाशे सर्वनाशनम्॥
(प्राचीन सूक्ति — प्राणों पर संकट आने पर भी ग्रंथों की रक्षा की जानी चाहिए; क्योंकि वेद और शास्त्र ही धर्म का मूल हैं, इनके नष्ट होने पर समूची संस्कृति का विनाश हो जाता है।)
नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी के धू-धू कर जलते पुस्तकालयों को देखकर आक्रांताओं ने मान लिया था कि भारत की मेधा सदा के लिए भस्म हो चुकी है। परंतु वे उन अनाम, त्यागी आचार्यों की साधना से अनजान थे, जिन्होंने अपनी पोटलियों में रोटी-कपड़े के स्थान पर ताड़पत्रों और भूर्जपत्रों पर लिखी पांडुलिपियों को बांधा। गंगा के मैदानों से लेकर कश्मीर की घाटियों तक, जब चारों ओर रक्तपात और विध्वंस था, तब ब्राह्मण विद्वान रात के घने अंधकार में, बीहड़ जंगलों, नेपाल की घाटियों, तिब्बत के दुर्गम दर्रों और दक्षिण के सघन अरण्यों की ओर पैदल निकल पड़े। जानिए सनातन ज्ञान-सम्पदा के उस महाप्रवास और गुप्त संरक्षण का अमर इतिहास।
१. ज्ञान की पोटली: जब देह से बढ़कर ग्रंथ हुआ
मध्यकाल में जब उत्तर भारत के मठ, गुरुकुल और पीठ आक्रांताओं के निशाने पर थे:
- ब्राह्मण विद्वानों ने अपनी पैतृक संपदा, घर-द्वार और भूमि का मोह छोड़ दिया। उन्होंने केवल एक संपदा को अपनी छाती से चिपकाया—वह थी वेदों, आयुर्वेद, खगोल, व्याकरण और तंत्र की प्राचीन पांडुलिपियाँ।
- विद्वानों ने इन ग्रंथों को सूती वस्त्रों में लपेटकर, हल्दी व नीम के प्राकृतिक रसायनों से सुरक्षित किया ताकि सीलन और कीटों से बचाया जा सके, और कठिन यात्राओं पर निकल पड़े।
मिथिला और बंगाल के पंडितों का प्रवास: नालंदा और विक्रमशिला के विध्वंस के बाद मिथिला, नवद्वीप और गौड़ देश के सैकड़ों ब्राह्मण आचार्य काठमांडू घाटी (नेपाल) की ओर भागे।
- दुर्गादत्त और हेमराज शर्मा जैसे विद्वानों का संग्रह: नेपाल के राजदरबारों और बौद्ध-हिंदू विहारों में इन पांडुलिपियों को छुपाया गया। आज भी नेपाल के 'नेशनल आर्काइव्स' और 'कैसर लाइब्रेरी' में सुरक्षित सहस्राब्दियों पुरानी शारदा और नेवारी लिपि की पांडुलिपियाँ उन्हीं ब्राह्मण प्रवासियों के तप का प्रमाण हैं।
- राहुल सांकृत्यायन ने भी २०वीं सदी में तिब्बत के बौद्ध विहारों से जिन दुर्लभ संस्कृत ग्रंथों को खोज निकाला, वे मूलतः मध्यकाल में भारतीय आचार्यों द्वारा ही वहां सुरक्षित पहुँचाए गए थे।
- जब कश्मीर की पावन घाटी में सिकंदर बुतशिकन जैसे आक्रांताओं ने शारदा पीठ और आचार्यों पर कहर बरपाया, तब कश्मीरी विद्वानों ने शारदा लिपि के अमूल्य आगम और दर्शन-ग्रंथों को पहाड़ों की गुप्त गुफाओं और भूमिगत तहखानों में दबाकर सुरक्षित किया।
- उत्तर भारत के सैकड़ों विद्वान परिवार विंध्याचल पार कर दक्षिण के विजयनगर साम्राज्य, तंजौर और केरल के नम्बूदिरी ब्राह्मणों के पास पहुँचे। दक्षिण भारत के ताड़पत्र संग्रहालय (जैसे तंजौर की सरस्वती महल लाइब्रेरी) इन्हीं उत्तर-भारतीय प्रवासी विद्वानों द्वारा लाए गए ग्रंथों से समृद्ध हुए।
४. गुप्त तहखाने, मिट्टी के मटके और कुएं
जब भागने का भी मार्ग न बचा, तब विद्वानों ने पांडुलिपियों को ताम्रपत्रों में बंद कर या मिट्टी के पके हुए घड़ों में मोम से सील करके मंदिरों की गुप्त दीवारों, तहखानों और सूखे कुओं के भीतर गाड़ दिया।
पीढ़ियों बाद जब शांति लौटी, तो उन्हीं सुरक्षित बीजों से पुनः वटवृक्ष रूपी ग्रंथालय पल्लवित हुए।
💡 निष्कर्ष
आज यदि हमारे पास चरक संहिता, चाणक्य का अर्थशास्त्र, अभिनवगुप्त का तंत्रालोक और उपनिषदों की मूल व्याख्याएं उपलब्ध हैं, तो यह उन अनाम ब्राह्मणों का उपकार है जिन्होंने अपनी जान देकर, भूखे-प्यासे रहकर ज्ञान की उस अखंड ज्योति को हिमालय से कन्याकुमारी तक सुरक्षित पहुँचाया।
अगले अंक में पढ़िए —
अंक २३: भक्ति आंदोलन — संत-परंपरा, सामाजिक जागरण और सनातन चेतना का पुनरुत्थान!
✍️-मधु शर्मा
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