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ब्राह्मण फ़ाइल्स अंक २४: मैकाले की कूटनीति के विरुद्ध वैचारिक दीवार — औपनिवेशिक काल में धर्म और संस्कृति की रक्षा

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥

(श्रीमद्भगवद्गीता ३/३५ — अपने धर्म में मरण भी कल्याणकारी है, दूसरे का धर्म भय को देने वाला है; औपनिवेशिक काल में इसी मंत्र ने भारत को वैचारिक दासता से बचाया।)

१८३५ में लॉर्ड मैकाले ने जब अपनी कुख्यात 'एजुकेशन मिनट' पेश की, तो ब्रिटिश हुकूमत का उद्देश्य केवल शासन करना नहीं था, बल्कि भारत की आत्मा को मथना था। मैकाले का स्पष्ट लक्ष्य था: "एक ऐसा वर्ग तैयार करना जो रक्त और रंग में भारतीय हो, किंतु रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेज हो।" अंग्रेजों ने भली-भांति जान लिया था कि जब तक भारत के पारंपरिक ज्ञान-वाहक (ब्राह्मण) और गुरुकुल जीवित हैं, तब तक सनातन समाज का धर्मांतरण और सांस्कृतिक दासता असंभव है। इसलिए अंग्रेजी हुकूमत ने सबसे तीखा वैचारिक व आर्थिक प्रहार ब्राह्मणों पर किया। परंतु इसी कालखंड में स्वामी दयानंद सरस्वती, लोकमान्य तिलक, ईश्वरचंद्र विद्यासागर और मदन मोहन मालवीय जैसे मनीषियों ने सीना तानकर औपनिवेशिक षड्यंत्रों को धूल चटा दी। जानिए उस ऐतिहासिक बौद्धिक महासंग्राम का सच।

१. मैकाले और मिशनरियों का दोहरा प्रहार: गुरुकुलों का विध्वंस

अंग्रेजी हुकूमत ने भारत के सामाजिक ताने-बाने को तोड़ने के लिए त्रिस्तरीय रणनीति अपनाई:

  • गुरुकुलों की आर्थिक रीढ़ पर चोट: विलियम एडम की १८३५ की रिपोर्ट के अनुसार, अकेले बंगाल और बिहार में १ लाख से अधिक गुरुकुल थे जहाँ समाज के हर वर्ग के बच्चे पढ़ते थे। अंग्रेजों ने मंदिर-न्यास और गुरुकुलों को मिलने वाली कर-मुक्त भूमि छीन ली, जिससे पारंपरिक शिक्षा तंत्र चरमरा गया।
  • संस्कृत और शास्त्रों का विकृत अनुवाद: विलियम जोन्स, मैक्स मूलर और बेथ्यून जैसे ओरिएंटलिस्टों ने वेदों और स्मृतियों के मनमाने, विभाजनकारी अनुवाद किए ताकि भारतीयों में अपनी ही संस्कृति के प्रति हीनभावना भरी जा सके और जातिगत खाई को गहरा किया जा सके।

२. स्वामी दयानंद सरस्वती और 'वेदों की ओर लौटो' का नाद

  • जब ब्रिटिश मिशनरी भोले-भाले भारतीयों को यह समझा रहे थे कि सनातन धर्म केवल अंधविश्वास और कुरीतियों का पुंज है, तब गुजरात के औदीच्य ब्राह्मण कुल में जन्मे महर्षि दयानंद सरस्वती ने 'सत्यार्थ प्रकाश' के माध्यम से मिशनरियों और मौलवियों के तर्कों की धज्जियाँ उड़ा दीं।
  • उन्होंने नारा दिया—"वेदों की ओर लौटो"। उन्होंने पाखंड खंडिनी पताका फहराई, जन्मना जातिवाद का प्रखर विरोध किया, शुद्धि आंदोलन चलाकर धर्मांतरित हिंदुओं की घर-वापसी कराई और डी.ए.वी. शिक्षण संस्थानों की नींव रखकर आधुनिक व वैदिक शिक्षा का समन्वय रचा।

३. महामना मदन मोहन मालवीय: काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) की स्थापना

  • मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के समानांतर भारतीय स्वाभिमान की शिक्षा देने के लिए महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने राजाओं से लेकर आम जनता तक से भिक्षा मांगकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की।
  • मालवीय जी ने सिद्ध किया कि विज्ञान और तकनीक की उच्च शिक्षा अपनी सांस्कृतिक जड़ों, संस्कृत भाषा और सनातन संस्कारों से जुड़े रहकर ही सार्थक हो सकती है।

४. लोकमान्य तिलक और बंकिमचंद्र: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अग्नि

  • लोकमान्य बालगंगाधर तिलक: चित्पावन ब्राह्मण कुल के तिलक जी ने अंग्रेजों के प्रतिबंधों को चुनौती देते हुए सार्वजनिक गणेशोत्सव और शिवाजी उत्सव का आरंभ किया। उन्होंने घरों में सिमटी पूजा को जन-आंदोलन बनाकर समूचे समाज को अंग्रेजों के विरुद्ध एकजुट कर दिया। 'गीता रहस्य' लिखकर उन्होंने कर्मयोग से युवाओं में स्वाधीनता की ज्वाला धधकाई।
  • बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय: 'आनंदमठ' उपन्यास में अमर गीत "वंदे मातरम्" रचकर स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा मंत्र दिया, जिसने फांसी के फंदे चूमने वाले अनगिनत क्रांतिकारियों को शक्ति दी।

💡 निष्कर्ष

अंग्रेजी राज केवल बंदूकों का राज नहीं था, वह एक गहन वैचारिक और सांस्कृतिक आक्रमण था। यदि उस दौर में ब्राह्मण विचारकों ने मिशनरियों के प्रोपेगैंडा को शास्त्रों के तर्क से न काटा होता और अपनी संस्कृति के लिए संस्थान न खड़े किए होते, तो भारत आज अपनी मूल पहचान खो चुका होता। यह वैचारिक रक्षा-कवच ही आगामी स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी शक्ति बना।

अगले अंक में पढ़िए —

भाग ५: राष्ट्र रक्षा, स्वतंत्रता संग्राम और वर्तमान युग — अंक २५: १८५७ की क्रांति का प्रथम बिगुल — क्रांतिवीर मंगल पांडे का अमर बलिदान!

✍️-मधु शर्मा

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